राहत सामग्री पर ‘डाका’ या भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा? बंगाल में पूर्व TMC नेताओं के घर से बोरियां मिलने पर सुलगती बहस
पश्चिम बंगाल… एक ऐसा राज्य जो कभी देश की कला, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करता था।
लेकिन पिछले कुछ दशकों में इस पावन धरा ने राजनीतिक हिंसा, चुनावी धांधली और भ्रष्टाचार का वो दौर देखा है जिसने लोकतंत्र को तार-तार कर दिया। आरोप लगते रहे हैं कि वहां लोगों को सिर्फ इसलिए प्रताड़ित किया गया या मार दिया गया क्योंकि उन्होंने सत्ताधारी दल के खिलाफ वोट करने की हिम्मत दिखाई। मतपेटियां लूटना, ‘जय श्री राम’ के उद्घोष पर पाबंदियां लगाना और राजनीतिक विरोधियों के घरों में खौफ का माहौल पैदा करना—यह बंगाल के सियासी सफर का एक स्याह पन्ना रहा है।
आज जब इन मामलों पर कानूनी शिकंजा कस रहा है और तथाकथित ‘अंडा ट्रीटमेंट’ यानी सख्त कार्रवाई के जरिए पाप के घड़े फूट रहे हैं, तो तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भ्रष्टाचार की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने पूरी जनता को आक्रोश से भर दिया है।
रिलीफ मटेरियल का गबन: जब गरीबों के हक पर मारा गया डाका
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जो मुर्शिदाबाद और आसपास के इलाकों के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह वीडियो कथित तौर पर टीएमसी के पूर्व विधायक अब्दुल सौमिक हुसैन और नेता जाफिकुल इस्लाम के ठिकानों से जुड़ा बताया जा रहा है।
इस वायरल वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि नेताओं के परिसरों से भारी मात्रा में बोरियां बाहर निकाली जा रही हैं। स्थानीय स्तर पर यह दावा किया जा रहा है कि ये बोरियां कोई सामान्य सामान नहीं हैं, बल्कि आपदा और संकट के समय गरीब जनता के लिए भेजा गया राहत कार्य का सामान यानी रिलीफ मटेरियल हैं, जिसे चुपचाप छुपा कर रखा गया था।
सोचिए, नीचता शब्द भी शायद इन हरकतों के आगे छोटा पड़ जाए। जो लोग आपदा के शिकार, गरीब और लाचार लोगों के मुंह का निवाला छीनकर उसे अपने घरों में डंप कर लें, उनसे किसी भी तरह की नैतिक जिम्मेदारी की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
‘लुटियंस इकोसिस्टम’ का दोहरा दर्द
विराम इस बात पर भी लगना चाहिए कि जब भी ऐसे भ्रष्ट नेताओं पर कानूनी एजेंसियों का डंडा चलता है, तो दिल्ली के वामपंथी-कांग्रेसी पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के पेट में दर्द शुरू हो जाता है। वे इसे ‘पॉलिटिकल वेंडेटा’ या विपक्ष को दबाने की साजिश बताने लगते हैं।
लेकिन जब सालों तक बंगाल की जनता का खून चूसा गया, जब वहां की फलती-फूलती इकॉनमी को गर्त में धकेल दिया गया, तब यह पूरा इकोसिस्टम रहस्यमयी चुप्पी साधे बैठा रहा। उस समय किसी को आम जनता के अधिकारों का हनन दिखाई नहीं दिया।
केंद्रीय योजनाओं की राह में रोड़ा
ममता सरकार पर सबसे बड़ा आरोप यह भी रहा है कि उन्होंने राजनीतिक द्वेष के कारण केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी और जनकल्याणकारी योजनाओं को बंगाल की जमीन पर उतरने ही नहीं दिया।
इसमें सबसे पहला नाम आयुष्मान भारत योजना का आता है, जो देश के करोड़ों गरीबों को पांच लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज देती है, लेकिन बंगाल के गरीब इस राजनीतिक जिद के कारण स्वास्थ्य लाभ से वंचित रह गए। इसी तरह हर घर नल योजना जैसी महत्वपूर्ण योजना, जिसका मकसद ग्रामीण इलाकों तक साफ पीने का पानी पहुंचाना था, उसकी राह में भी लगातार राजनीतिक रोड़े अटकाए गए ताकि जनता तक विकास न पहुंच सके।
एजेंसियों की इस सख्त कार्रवाई और जांच के बाद अब बंगाल के लोग यह उम्मीद लगा रहे हैं कि राज्य में कानून का राज स्थापित होगा, तुष्टिकरण का अंत होगा और ‘जय श्री राम’ के उद्घोष के साथ बंगाल को एक बार फिर से देश का आर्थिक और औद्योगिक हब बनाया जा सकेगा।
निष्कर्ष: पाप के घड़े का फूटना तय है
चाहे कितनी भी राजनीतिक ढाल तैयार कर ली जाए, लेकिन जब जनता के हक का पैसा और गरीबों की राहत सामग्री राजनेताओं के घरों की शोभा बढ़ाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि पतन की शुरुआत हो चुकी है। अब समय आ गया है कि बंगाल की इस पावन भूमि को भ्रष्टाचारियों और गुंडातत्वों से मुक्त कराकर ‘बंगाली मानुष’ को उसका असली अधिकार वापस दिलाया जाए।
