डिजिटल सेंसरशिप या नई ‘इमरजेंसी’? हिमाचल में सुक्खू सरकार के खिलाफ बोलने वाले न्यूज़ चैनल के वीडियो और अकाउंट्स ब्लॉक!

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क्या आपको 1975 का आपातकाल (Emergency) याद है? यह वह दौर था जब अख़बार में कुछ भी छापने से पहले सरकार की लिखित इजाज़त लेनी पड़ती थी और हुकूमत से सवाल पूछना देश का सबसे बड़ा अपराध बन जाता था। आज 51 साल बाद एक बार फिर देश में वही सवाल गूंज रहा है—क्या वही पुरानी सेंसरशिप वाली मानसिकता लौट रही है? क्या कांग्रेस आज भी इसी सामंती सोच पर आगे बढ़ रही है कि देश की सत्ता और जनता की आवाज़ उनकी जागीर है?

हिमाचल प्रदेश से हाल ही में सामने आई एक चौंकाने वाली घटना ने देश में ‘प्रेस की आज़ादी’ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ दी है।

डिजिटल मीडिया पर डिजिटल सेंसरशिप: क्या है पूरा मामला?

आरोप है कि हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार की नीतियों और फैसलों पर सवाल उठाने वाले एक लोकप्रिय डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म News4Himalayan के 20 से ज़्यादा वीडियो को भारत में ब्लॉक (प्रतिबंधित) कर दिया गया है। मामला सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दावा किया जा रहा है कि इस कार्रवाई के तुरंत बाद उस मीडिया संस्थान का फेसबुक पेज और इंस्टाग्राम अकाउंट भी भारत में पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया।

आखिर किन मुद्दों पर की गई थी रिपोर्टिंग?

सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिन मुद्दों पर यह चैनल रिपोर्टिंग कर रहा था, वे कोई देश की सुरक्षा से जुड़े गुप्त दस्तावेज़ नहीं थे, बल्कि पूरी तरह सार्वजनिक और जनता से जुड़े विषय थे। हिमाचल सरकार पर लगातार बढ़ता भारी-भरकम कर्ज़। राज्य का बजट और वित्तीय कुप्रबंधन। जनता को परेशान करने वाला स्मार्ट मीटर विवाद। प्रशासनिक फैसलों में कथित घोटाले और कमियां। ये वही मुद्दे हैं, जिन्हें लेकर वर्तमान सुक्खू सरकार लगातार बैकफुट पर चल रही है। राजस्व घाटे (Revenue Deficit) की वजह से राज्य में सरकारी कर्मचारियों के वेतन तक समय पर नहीं मिल पा रहे हैं। ऐसे में ये सवाल बेहद लाज़मी और लोकतांत्रिक थे, लेकिन शायद सुक्खू सरकार इन वाजिब सवालों से घबरा गई।

सिलसिलेवार ‘डिजिटल अटैक’: तारीख-दर-तारीख

डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘News4Himalayan’ का आरोप है कि उनके खिलाफ एक सोची-समझी रणनीति के तहत कार्रवाई की गई:

17 जून, सबसे पहले चैनल की 20 से अधिक महत्वपूर्ण वीडियोज़ को अचानक ब्लॉक कर दिया गया। 18 जून, अगले ही दिन उनके फेसबुक पेज की रीच (पहुंच) को पूरी तरह सीमित कर दिया गया। 21 जून, इसके बाद उनके आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट को भी भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया।

बिना किसी पूर्व सूचना के कार्रवाई: संस्था का दावा है कि उनके पास इस तानाशाही कार्रवाई से जुड़े नोटिस और स्क्रीनशॉट मौजूद हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह कार्रवाई किस कानून के तहत और क्यों हुई? प्लेटफॉर्म का कहना है कि उन्हें न तो कोई स्पष्ट कारण बताया गया, न यह स्पष्ट किया गया कि उनका कौन सा कंटेंट आपत्तिजनक था, और न ही उन्हें अपना पक्ष रखने का कोई मौका दिया गया।

राहुल गांधी का ‘प्रेस फ्रीडम नैरेटिव’ बनाम केरल-हिमाचल की हकीकत

कांग्रेस और खासकर उनके शीर्ष नेता राहुल गांधी अक्सर देश से लेकर विदेशों (जैसे अमेरिका और यूके) के मंचों पर जाकर भारत में ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ और ‘खतरे में लोकतंत्र’ की दुहाई देते रहते हैं।

आपको याद होगा, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नॉर्वे के दौरे पर थे, तब वहां की एक पत्रकार द्वारा उठाए गए सवालों और ‘प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ के बहाने गढ़े गए नैरेटिव की वीडियोज़ को कांग्रेस के इकोसिस्टम ने सोशल मीडिया पर खूब वायरल किया था। तब वे प्रेस कॉन्फ्रेंस और मीडिया की आज़ादी के सबसे बड़े पैरोकार बन रहे थे।

लेकिन आज सवाल यह है कि क्या प्रेस की आज़ादी का पैमाना सत्ता बदलते ही बदल जाता है? ‘News4Himalayan’ का कहना है कि सुक्खू सरकार द्वारा प्रताड़ित किए जाने का यह पहला वाक़या नहीं है। इससे पहले भी उनके खिलाफ पुलिस में एफआईआर (FIR) दर्ज कराई गईं, तरह-तरह की शिकायतें की गईं और यहां तक कि हिमाचल प्रदेश विधानसभा की ओर से उन्हें ‘विशेषाधिकार हनन’ का नोटिस तक भेजा जा चुका है।

नो एंट्री’ का प्रोटोकॉल: पार्टियों की अंदरूनी मानसिकता का सच

यह तानाशाही रवैया सिर्फ हिमाचल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस इकोसिस्टम के डीएनए में है। मीडिया बीट्स और ग्राउंड रिपोर्टिंग के कुछ बेहद कड़वे अनुभव इस बात की गवाही देते हैं:

कांग्रेस (इंदिरा भवन): कांग्रेस के नए मुख्यालय ‘इंदिरा भवन’ को लेकर कई वरिष्ठ महिला पत्रकारों का यह अनुभव रहा है कि वहां बिना लिखित या पूर्व अनुमति के मीडिया को अंदर जाने की इजाज़त तक नहीं होती।

आम आदमी पार्टी (दिल्ली सचिवालय): जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार पूर्ण हनक में थी, तब दिल्ली सचिवालय और उनके पार्टी दफ़्तर में मीडिया की एंट्री पर कड़े पहरे थे। केवल चुनिंदा और आमंत्रित पत्रकारों को ही अंदर जाने की अनुमति थी ताकि सिर्फ वही सवाल पूछे जाएं जो सरकार सुनना चाहती है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा मुख्यालय): इसके विपरीत, जब देश के अन्य पत्रकार भाजपा मुख्यालय जाते हैं, तो वहां ऐसा कोई प्रोटोकॉल या दबाव नहीं होता कि सिर्फ सिलेक्टेड मीडिया ही कवरेज करेगा या पहले से तय (Selected) सवाल ही पूछे जाएंगे। वहां हर मीडियाकर्मी को अपनी बात रखने और सवाल पूछने की पूरी आज़ादी मिलती है।

निष्कर्ष: 51 साल बाद भी ‘आपातकाल’ वाली सोच यथावत

सौ बात की एक बात यह है कि कांग्रेस और उसका पूरा इकोसिस्टम आज भी 1975 वाली उसी आपातकाल की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया है। विपक्ष में रहते हुए जो लोग देश पर ‘अघोषित तानाशाही’ (Undeclared Dictatorship) का आरोप लगाते हैं, सत्ता मिलते ही वे खुद घोषित तानाशाह की तरह व्यवहार करने लगते हैं। हिमाचल की यह घटना साबित करती है कि वे आज भी मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक जागीर का एक हिस्सा बनाना चाहते हैं।

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