जब रात के 3 बजे गांवों को घेर लेती थी पुलिस: आपातकाल की नसबंदी का वो दौर, जिसे भारत आज भी नहीं भूला
भारत के इतिहास में 1975 से 1977 का आपातकाल कई कारणों से विवादित रहा, लेकिन अगर उस दौर की सबसे चर्चित और दर्दनाक घटनाओं का जिक्र किया जाए तो नसबंदी अभियान का नाम सबसे ऊपर आता है।
जनसंख्या नियंत्रण से शुरू हुई कहानी
1970 के दशक में भारत तेजी से बढ़ती आबादी की चुनौती का सामना कर रहा था। सरकार ने परिवार नियोजन कार्यक्रम को तेज करने का फैसला किया। शुरुआत में यह अभियान स्वैच्छिक था, लेकिन आपातकाल के दौरान इसकी तस्वीर बदल गई। सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों और स्थानीय प्रशासन को नसबंदी के लक्ष्य दिए जाने लगे। कई राज्यों में अधिकारियों की पदोन्नति और प्रदर्शन को भी इन लक्ष्यों से जोड़ दिया गया। नतीजा यह हुआ कि लोगों को नसबंदी के लिए मनाने की जगह उन पर दबाव डाला जाने लगा।
जब लक्ष्य पूरा करने की होड़ मच गई
1975-76 में देशभर में लगभग 26 लाख नसबंदी ऑपरेशन हुए थे। लेकिन अगले ही साल 1976-77 में यह संख्या बढ़कर 81 लाख से अधिक पहुंच गई। बाद में शाह आयोग की जांच में सामने आया कि आपातकाल के दौरान कुल 1.07 करोड़ से ज्यादा लोगों की नसबंदी की गई, जो सरकार द्वारा तय लक्ष्य से भी काफी अधिक थी।
गांवों, बस अड्डों और बाजारों से उठाए गए लोग
उस दौर से जुड़ी कई रिपोर्टों और गवाहियों में दावा किया गया कि कई जगहों पर लोगों को जबरन नसबंदी शिविरों में ले जाया गया। हरियाणा के उत्तावर गांव का मामला सबसे चर्चित उदाहरणों में शामिल है। 6 नवंबर 1976 को रात के करीब 3 बजे पुलिस ने गांव को घेर लिया और सैकड़ों लोगों को पकड़कर नसबंदी शिविरों में पहुंचाया। यह घटना अंतरराष्ट्रीय स्तर तक चर्चा का विषय बनी थी।
शाह आयोग ने क्या पाया?
आपातकाल समाप्त होने के बाद गठित जस्टिस जे.सी. शाह आयोग ने नसबंदी अभियान की भी जांच की। आयोग के सामने 548 ऐसे मामलों की शिकायतें आईं जिनमें अविवाहित लोगों की नसबंदी किए जाने का आरोप था। इसके अलावा 1,774 मौतों की जानकारी भी आयोग के रिकॉर्ड में दर्ज हुई।
जनता का गुस्सा और राजनीतिक असर
नसबंदी अभियान को लेकर जनता में भारी नाराजगी पैदा हुई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस की हार के पीछे आपातकाल और नसबंदी अभियान के प्रति लोगों का गुस्सा एक बड़ा कारण था। आज लगभग 50 साल बाद भी आपातकाल की नसबंदी सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि राज्य की ताकत और नागरिकों की स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर होने वाली बहस का एक महत्वपूर्ण अध्याय मानी जाती है।
