राजनीतिक साम्राज्य का पतन या वफादारों का विद्रोह? ममता बनर्जी के सियासी सफर पर एक तीखा विश्लेषण
पश्चिम बंगाल की सियासत से जो खबरें आ रही हैं, वह किसी बड़े राजनीतिक भूकंप से कम नहीं हैं…
जो हाल आज ममता बनर्जी का बंगाल में देखने को मिल रहा है, वह किसी भी कद्दावर राजनेता के लिए एक बहुत बड़ा सबक है। इस अभूतपूर्व राजनीतिक मोड़ पर न तो जौन एलिया की कोई शायरी मरहम लगा पाएगी, और न ही बशीर बद्र की कोई ग़ज़ल काम आएगी। बंगाल में सत्ता परिवर्तन हुआ, भाजपा सत्ता के शीर्ष पर पहुंची, लेकिन सबसे बड़ा झटका ममता बनर्जी को विपक्ष से नहीं, बल्कि उनकी अपनी ही पार्टी के भीतर से लगा है।
अपनों का ही ‘विद्रोह’: रातों-रात ढह गया साम्राज्य
कोलकाता में हुई तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी विधायकों की बैठक ने बंगाल की राजनीति की दिशा को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। पार्टी के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके ही सबसे भरोसेमंद वफादारों ने दरकिनार कर दिया।
यह सिर्फ कार्रवाई नहीं है, बल्कि उन बागी विधायकों का सीधा विद्रोह है जिन्होंने पिछले 15 सालों से बंगाल में ‘दीदी’ की उस हनक को देखा और पाला था। जिस साम्राज्य को भारी राजनीतिक रसूख से खड़ा किया गया था, उसे रातों-रात उनके ही करीबियों ने हिलाकर रख दिया। आरोप लग रहे हैं कि खुद को ‘गरीब मुख्यमंत्री’ की छवि में रखकर अपने भतीजे के लिए सोने का सिंहासन तैयार करने की चाहत ने इस बगावत की नींव रखी।
उद्धव ठाकरे जैसी नियति: एक ही दर्द के दो मुसाफिर
ममता बनर्जी के इस सियासी दर्द को आज पूरी दुनिया में शायद एक ही व्यक्ति सबसे बेहतर समझ सकता है – और वो हैं उद्धव ठाकरे। जिस तरह महाराष्ट्र में शिवसेना के भीतर बड़ा विद्रोह हुआ और एक स्थापित पार्टी दो फाड़ हो गई, ठीक वैसा ही हाल आज टीएमसी (TMC) का नजर आ रहा है। संख्याबल और चुनाव आयोग के फैसले पर पार्टी का भविष्य जरूर टिका है, लेकिन ममता बनर्जी का वह एकछत्र राज अब समाप्त हो चुका है।
जेपी आंदोलन की ‘शेरनी’ से ‘सत्ता के जागीरदार’ तक का सफर
आज जब ममता बनर्जी इस दोराहे पर खड़ी हैं, तो इतिहास के पन्नों में उनकी वह छवि भी तैरती है जब वह एक जुझारू छात्र नेता थीं। आंदोलन की उपज – इमरजेंसी के दौर में जयप्रकाश नारायण (जेपी) की कार के बोनट पर चढ़कर निडरता से विरोध प्रदर्शन करने वाली वह युवा ममता। संसद की बुलंद आवाज – लोकसभा में अपनी कड़क और बेबाक आवाज से विरोधियों को चुप करा देने वाली सांसद, जिन्हें देखकर देश उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखता था। 2011 का ऐतिहासिक बदलाव – कम्युनिस्टों के दशकों पुराने लाल किले को धूल चटाकर सत्ता में आने वाली ‘बंगाल की शेरनी’।
लेकिन आलोचकों का मानना है कि सत्ता के शीर्ष पर पहुंचते ही वही ममता बनर्जी बंगाल की जनता की उम्मीदों से दूर होती चली गईं। आज उसी का नतीजा है कि उनके अपने ही वफादार उनका साथ छोड़ रहे हैं।
निष्कर्ष: बंगाल किसी की जागीर नहीं
अब चाहे कांग्रेस में विलय की कोशिशें हों या एक नई पार्टी खड़ी करने की जद्दोजहद, राजनीतिक पंडितों का मानना है कि ममता बनर्जी का वह पुराना दौर अब वापस नहीं आने वाला।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि जिसे पिछले 15 सालों से ममता बनर्जी ने अपनी ‘जागीर’ समझ बैठी थी, वह असल में किसी नेता या दल की जागीर नहीं, बल्कि ‘बंगाली मानुष’ का बंगाल है। जनता और वक्त जब करवट लेता है, तो बड़े से बड़े राजनीतिक सूरमाओं के साम्राज्य भी जमींदोज हो जाते हैं।
