कोटा में ‘छात्रों की गूँज’ या राजनीतिक मंच? राहुल गांधी के कार्यक्रम पर उठ रहे सवाल

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राहुल गांधी

राजस्थान का कोटा देशभर में मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। हर साल लाखों छात्र NEET और JEE जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल करने के सपने के साथ यहां पहुंचते हैं। लेकिन इस बार कोटा शिक्षा या परीक्षा की वजह से नहीं, बल्कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी के “छात्रों की गूँज” कार्यक्रम को लेकर चर्चा में है।

कार्यक्रम के बाद अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह वास्तव में छात्रों की समस्याओं को सुनने और उन पर चर्चा करने का मंच था, या फिर इसे राजनीतिक संदेश देने के लिए इस्तेमाल किया गया।

परीक्षा से ठीक पहले क्यों हुआ आयोजन?

सबसे अधिक चर्चा कार्यक्रम के समय को लेकर हो रही है। 21 जून को RE-NEET परीक्षा प्रस्तावित है और राहुल गांधी का कार्यक्रम परीक्षा से ठीक चार दिन पहले आयोजित किया गया।

आलोचकों का कहना है कि यदि उद्देश्य छात्रों की समस्याओं को उठाना था, तो इसके लिए पहले भी पर्याप्त समय उपलब्ध था। NEET परीक्षा को लेकर विवाद और विरोध प्रदर्शन कई सप्ताह से चल रहे थे। ऐसे में कार्यक्रम परीक्षा के बेहद नजदीक आयोजित किए जाने पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

वहीं समर्थकों का तर्क है कि कोटा छात्रों की समस्याओं को समझने और सुनने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान है, क्योंकि यहां देशभर के छात्र मौजूद रहते हैं।

मंच पर हुई शिक्षा और रोजगार पर चर्चा

कार्यक्रम के दौरान कई छात्रों को मंच पर बुलाया गया। शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं, बेरोजगारी और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।

हालांकि सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा एक छात्रा द्वारा दिए गए चयन प्रतिशत के उदाहरण को लेकर हुई। कार्यक्रम के दौरान UPSC चयन दर को लेकर एक उदाहरण प्रस्तुत किया गया, जिसमें कहा गया कि यदि 100 छात्रों में से एक छात्र का चयन होता है तो चयन प्रतिशत 0.01 प्रतिशत होता है।

इसके बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इस गणना पर सवाल उठाए। आलोचकों का कहना था कि 100 में से एक छात्र का चयन होने पर प्रतिशत 1 प्रतिशत होता है, न कि 0.01 प्रतिशत।

यही बिंदु कार्यक्रम के बाद ऑनलाइन बहस का विषय बन गया।

UPSC और प्रतियोगी परीक्षाओं पर भी हुई चर्चा

कार्यक्रम में UPSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में कम चयन दर को लेकर भी चर्चा हुई। आलोचकों का कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में सीमित सीटों और लाखों अभ्यर्थियों के बीच प्रतिस्पर्धा के कारण चयन प्रतिशत स्वाभाविक रूप से कम होता है।

उनका तर्क है कि कम चयन प्रतिशत को केवल सरकार या व्यवस्था की विफलता के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं माना जा सकता।

वहीं कार्यक्रम में मौजूद छात्रों और कांग्रेस नेताओं ने शिक्षा व्यवस्था और अवसरों की उपलब्धता को लेकर अपने विचार रखे।

सोशल मीडिया पर छाया कार्यक्रम

कार्यक्रम के बाद कांग्रेस और उसके समर्थकों ने सोशल मीडिया पर इससे जुड़े वीडियो और क्लिप साझा किए। इन पोस्टों में शिक्षा, रोजगार और युवाओं के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया।

दूसरी ओर कार्यक्रम के आलोचकों ने भी कई वीडियो और तस्वीरें साझा करते हुए भीड़, उपस्थिति और मंच पर हुई चर्चाओं को लेकर सवाल उठाए।

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कोटा जैसे शहर में छात्रों के बीच संवाद करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए स्वाभाविक रणनीति हो सकती है, क्योंकि युवा मतदाता देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

बीजेपी ने भी जताई आपत्ति

राहुल गांधी के इस कार्यक्रम को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने भी आपत्ति जताई है। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों के बीच इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करना उचित नहीं है और इससे छात्रों का ध्यान भटक सकता है।

हालांकि कांग्रेस का कहना है कि युवाओं और छात्रों की समस्याओं को सुनना विपक्ष का दायित्व है और इसी उद्देश्य से यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

बहस जारी

फिलहाल “छात्रों की गूँज” कार्यक्रम को लेकर राजनीतिक बहस जारी है। एक पक्ष इसे छात्रों के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की पहल बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे राजनीतिक गतिविधि और चुनावी रणनीति का हिस्सा मान रहा है।

अब यह बहस आगे भी जारी रह सकती है कि कोटा में आयोजित यह कार्यक्रम वास्तव में छात्रों के हित में था या फिर राजनीतिक संदेश देने का एक मंच।

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