आपातकाल का वो किस्सा: जब इंदिरा गांधी और महारानी गायत्री देवी की दुश्मनी ने देश की सियासत को हिला दिया

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Indira Gandhi and Gayatri Devi Conflict: साल 1975, देश में आपातकाल (Emergency) की घोषणा हो चुकी थी। लोकतंत्र के बुनियादी अधिकार निलंबित थे और देश के बड़े-बड़े राजनीतिक दिग्गज सलाखों के पीछे भेजे जा रहे थे। लेकिन इसी दौरान, दिल्ली की तिहाड़ जेल के महिला वार्ड में एक ऐसी कैदी की एंट्री हुई, जिसकी खूबसूरती और अंदाज के चर्चे कभी दुनिया की मशहूर फैशन मैगजीन VOGUE में हुआ करते थे।

वह कैदी नंबर 2265 कोई साधारण कैदी नहीं, बल्कि जयपुर की राजमाता महारानी गायत्री देवी थीं। यह लड़ाई सिर्फ दो रसूखदार महिलाओं की नहीं थी; यह लोकतांत्रिक सत्ता के अहंकार और राजशाही के आखिरी ग्लैमर के बीच का वो टकराव था, जिसने भारतीय राजनीति के इतिहास में सबसे कड़वी और व्यक्तिगत दुश्मनी की इबारत लिखी।

शांतिनिकेतन: जहां बोए गए थे इस कड़वाहट के बीज

इस ऐतिहासिक दुश्मनी की शुरुआत 1975 में नहीं, बल्कि चार दशक पहले 1930 के दशक में पश्चिम बंगाल के शांत माहौल में बसे शांतिनिकेतन में हुई थी। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के इस आश्रम में भारत के दो सबसे रसूखदार परिवारों की बेटियां पढ़ रही थीं। एक थीं इंदिरा प्रियदर्शिनी (जवाहरलाल नेहरू की बेटी) और दूसरी थीं आयशा (कूचबिहार के शाही परिवार की राजकुमारी, जिन्हें बाद में दुनिया ने महारानी गायत्री देवी के नाम से जाना)।

इतिहासकार जॉन जुब्रिज्की ने अपने लेख ‘Jaipur’s Last Stand’ में जिक्र किया है कि शांतिनिकेतन में इन दोनों लड़कियों की दुनिया एक-दूसरे से बिलकुल जुदा थी:

  • इंदिरा गांधी: शुरू से ही अंतर्मुखी (introvert) थीं। उनके घर का माहौल हमेशा राजनीतिक बहसों, जेल यात्राओं और देश की चिंताओं से घिरा रहता था, जिसके कारण उनके चेहरे पर एक गंभीरता और अकेलापन साफ झलकता था।
  • गायत्री देवी: बेबाक, आधुनिक और बेहद खूबसूरत थीं। वे घुड़सवारी करती थीं, सिगरेट पीती थीं और अपनी मर्जी से जिंदगी जीती थीं।

दिग्गज पत्रकार खुशवंत सिंह ने अपने संस्मरणों में दावा किया है कि इंदिरा गांधी के मन में गायत्री देवी को लेकर एक अनजानी असुरक्षा की भावना शायद इसी दौर से पनपने लगी थी। इंदिरा को जहां राजनीतिक अनुशासन के दायरे में रहना पड़ता था, वहीं गायत्री देवी के पास अथाह पैसा, गजब की खूबसूरती और एक बेफिक्र अंदाज था। आगे चलकर गायत्री देवी जयपुर के महाराजा मानसिंह द्वितीय की पत्नी बनकर ‘जयपुर की महारानी’ बन गईं और इंदिरा राजनीति के गलियारों में देश का भविष्य तय करने लगीं।

1962 का चुनाव: जब महारानी ने बनाया ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’

आजादी के बाद देश बदल रहा था। राजा-महाराजाओं की रियासतें भारत संघ में शामिल हो चुकी थीं और नेहरू जी के नेतृत्व में कांग्रेस का एकछत्र राज था। नेहरू समाजवाद के समर्थक थे और राजाओं के विशेषाधिकारों के खिलाफ थे। इसी बीच 1959 में, कांग्रेस की नीतियों से नाराज होकर देश के पहले गवर्नर-जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने ‘स्वतंत्र पार्टी’ का गठन किया। वे जानते थे कि राजस्थान में कांग्रेस को पटखनी देने के लिए उन्हें एक ऐसे चेहरे की जरूरत है जिसकी लोकप्रियता के सामने सब फीके पड़ जाएं। वह चेहरा बनीं महारानी गायत्री देवी।

साल 1962 के तीसरे लोकसभा चुनाव में गायत्री देवी ने जयपुर लोकसभा सीट से स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर पर्चा दाखिल किया। जब नतीजे आए, तो दिल्ली हिल गई। गायत्री देवी को कुल पड़े वोटों का लगभग 77 फीसदी वोट मिला था। यह जीत इतनी विशाल थी कि इसे ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में दर्ज किया गया। खुद अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी ने इस ऐतिहासिक जीत की सराहना की थी।

संसद में टकराव

1966 में इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं। अब संसद का नजारा देखने लायक था, एक तरफ सत्ता की कमान ‘आयरन लेडी’ इंदिरा गांधी के हाथों में थी, तो दूसरी तरफ विपक्ष की अग्रिम पंक्ति में जयपुर की राजमाता गायत्री देवी बैठी थीं। संसद में जब भी गायत्री देवी बोलती थीं, वे अपनी तीखी अंग्रेजी में इंदिरा सरकार की आर्थिक नीतियों पर हमला करती थीं। खुशवंत सिंह ने अपनी किताब ‘Indira Gandhi Returns’ में संसद के एक बेहद तल्ख वाकये का जिक्र किया है, जब गायत्री देवी के तीखे सवालों से परेशान होकर इंदिरा गांधी ने अपना आपा खो दिया था।

Indira Gandhi Returns. book at Best Book Centre.

“आप तो कांच की गुड़िया हैं। संसद आपके लिए नहीं है। आपको संसद में बैठकर भाषण देने के बजाय अपने आलीशान महलों में रहना चाहिए। आप लोग अतीत के अवशेष हैं, जिनका लोकतंत्र में कोई वजूद नहीं होना चाहिए।”

इंदिरा गांधी (संसद में गायत्री देवी की तरफ इशारा करते हुए)

गायत्री देवी ने भी तुरंत पलटवार करते हुए कहा था कि वे महलों से जरूर आती हैं, लेकिन उन्हें जयपुर की जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से चुनकर और दुनिया के सबसे बड़े अंतर से जिताकर यहां भेजा है। उन्होंने इंदिरा सरकार को ‘तानाशाही की ओर ले जाने वाला रास्ता’ करार दिया था।

प्रिवी पर्स का खात्मा और एमरजेंसी का वो ‘काला दौर’

साल 1971 में इंदिरा गांधी ने संविधान में 26वां संशोधन करके ‘प्रिवी पर्स’ (राजा-महाराजाओं को मिलने वाला सालाना भत्ता और विशेषाधिकार) को खत्म कर दिया। यह जयपुर राजघराने के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका था, लेकिन असली राजनीतिक प्रहार होना अभी बाकी था। 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू हुआ। विपक्षी नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया। इसी दौरान इंदिरा गांधी के आदेश पर आयकर विभाग और ईडी (ED) की टीमों ने जयपुर के राजमहल और मोती डूंगरी महल पर छापेमारी की। अंततः, 30 जुलाई 1975 को राजमाता गायत्री देवी को दिल्ली में गिरफ्तार कर लिया गया।

कैदी नंबर 2265: तिहाड़ जेल का वो खौफनाक मंजर

दुनिया के सबसे महंगे होटलों और महलों में रहने वाली महारानी अब तिहाड़ जेल की कैदी नंबर 2265 बन चुकी थीं। उन्होंने अपनी आत्मकथा “A Princess Remembers” में उस जेल के नरक जैसे माहौल का दर्दनाक विवरण दिया है:

A Princess Remembers-memoirs Of Maharani Of Jaipur

“तिहाड़ जेल किसी नरक से कम नहीं थी। वह एक मछली बाजार की तरह थी जहां हर समय चोर, जेबकतरे और वेश्याएं चिल्लाती रहती थीं। शौचालय टूटे हुए थे, नालियां खुली थीं और मच्छरों का ऐसा आतंक था कि रात भर सोना नामुमकिन था। गर्मी और बदबू के कारण सांस लेना दूभर था।”

वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र कपूर के मुताबिक, तिहाड़ जेल की बदतर आबोहवा के कारण गायत्री देवी का वजन तेजी से गिरा और वे गंभीर रूप से बीमार हो गईं। आखिरकार, अंतरराष्ट्रीय दबाव और डॉक्टरों की सलाह के बाद, लगभग 5 महीने जेल में काटने के बाद उन्हें पैरोल पर रिहा किया गया।

इतिहास का फैसला

1977 में जब आपातकाल खत्म हुआ और चुनाव हुए, तो देश की जनता ने इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल कर दिया। कई लोगों का मानना था कि गायत्री देवी अब इंदिरा से अपना राजनीतिक बदला लेंगी, लेकिन उन्होंने सबको चौंकाते हुए सक्रिय राजनीति से हमेशा के लिए संन्यास ले लिया। इंदिरा गांधी ने राजा-महाराजाओं के विशेषाधिकार खत्म करके खुद को ‘गरीबों की मसीहा’ साबित करने की कोशिश जरूर की, लेकिन आपातकाल और गायत्री देवी जैसी लोकप्रिय नेता को जेल भेजने का दाग वे अपने दामन से कभी नहीं धो पाईं। वहीं दूसरी ओर, गायत्री देवी ने तिहाड़ की सलाखों के पीछे रहकर भी अपनी गरिमा और जयपुर की जनता के प्रति अपनी निष्ठा को कम नहीं होने दिया।

किस्से-कहानियां वीडियो में:

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