संजय गांधी की मौत के बाद अस्पताल में क्यों एक ‘खुफिया चाबी’ ढूंढ रही थीं इंदिरा गांधी? जानें इनसाइड स्टोरी
Sanjay Gandhi Death: 23 जून 1980 की सुबह। दिल्ली का राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल। बाहर हज़ारों की भीड़ सन्न खड़ी थी, क्योंकि कुछ ही मिनट पहले देश के सबसे शक्तिशाली युवा नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी की एक विमान हादसे में मौत हो चुकी थी।
अस्पताल के एक बंद वीआईपी कमरे के भीतर, भारत की सबसे ताकतवर महिला अपने बेटे के क्षत-विक्षत शव के सामने खड़ी थीं। एक मां के लिए यह दुनिया का सबसे बड़ा दुख था। लेकिन, उस बंद कमरे में जो कुछ हुआ, उसने वहां मौजूद चुनिंदा डॉक्टरों, सुरक्षा अधिकारियों और चश्मदीदों के होश उड़ा दिए।
इंदिरा गांधी वहां सिर्फ रोने या शोक मनाने के लिए नहीं रुकीं। उनके चेहरे पर गहरा दुख तो था, लेकिन उससे भी बड़ी एक अजीब सी छटपटाहट और बेचैनी थी। गवाहों के अनुसार, इंदिरा गांधी ने आगे बढ़कर संजय गांधी के खून से सने कुर्ते-पायजामे की जेबों को टटोलना शुरू कर दिया। जब जेबों में वो चीज नहीं मिली, तो उन्होंने वहां मौजूद अधिकारियों से कड़क आवाज़ में पूछा:
“संजय का सामान कहां है? उसकी चाबियां कहां हैं?”
एक मां, जिसके जवान बेटे का शव सामने पड़ा हो, वो उस वक्त एक अदद चाबी के लिए इतनी बेचैन क्यों थी? आखिर उस चाबी के पीछे ऐसा कौन सा राज छिपा था, जो अगर देश के सामने आ जाता तो नेहरू-गांधी परिवार और पूरी कांग्रेस सरकार बिखर सकती थी? आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक रहस्य की इनसाइड स्टोरी।
23 जून 1980 की वो मनहूस सुबह
साल 1975 से 1980 का दौर भारतीय राजनीति का सबसे उथल-पुथल वाला दौर था। कहने को तो देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं, लेकिन सरकार और पार्टी की असल कमान संजय गांधी के हाथ में थी। 1975 में जब देश में आपातकाल (Emergency) लागू हुआ, तो संजय गांधी सत्ता के सबसे बड़े केंद्र बनकर उभरे। वे न तो कैबिनेट मंत्री थे और न ही उनके पास कोई संवैधानिक पद था, लेकिन उनका हुक्म ही कानून था।
संजय गांधी को ‘फ्लाइंग’ यानी विमान उड़ाने का जुनून था। दिल्ली के फ्लाइंग क्लब में कुछ ही समय पहले एक नया और बेहद संवेदनशील टू-सीटर विमान शामिल हुआ था Pitts S-2A।
- सुबह 7:10 बजे: संजय गांधी सफदरजंग एयरपोर्ट से इस विमान में उड़ान भरते हैं। उनके साथ को-पायलट के तौर पर पूर्व कैप्टन सुभाष सक्सेना भी मौजूद थे।
- हादसे का कारण: आसमान में संजय गांधी ने विमान से कुछ खतरनाक कलाबाजियां (Aerobatics) दिखानी शुरू कीं। लेकिन तीसरे लूप के दौरान विमान का इंजन अचानक बंद हो गया।
- अंतिम क्षण: विमान ने अपनी ‘लिफ्ट’ खो दी और अनियंत्रित होकर चाणक्यपुरी के रिहायशी इलाके में अशोक होटल के ठीक पीछे एक नीम के पेड़ से टकरा गया। धमाका इतना ज़बरदस्त था कि विमान के परखच्चे उड़ गए और दोनों की मौके पर ही मौत हो गई।
क्या था उस चाबी का राज?
जैसे ही क्रैश की खबर फैली, पूरी दिल्ली स्तब्ध रह गई। इंदिरा गांधी बदहवास हालत में राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचीं। इस घटना का सबसे प्रामाणिक और रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण देश के दिग्गज पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा ‘Beyond the Lines’ (एक जिंदगी काफी नहीं) में दिया है। लुटियंस दिल्ली की राजनीति को करीब से देखने वाले कुलदीप नैयर लिखते हैं:
“जब इंदिरा गांधी अस्पताल के उस वीआईपी कमरे में दाखिल हुईं, जहां संजय का शव स्ट्रेचर पर रखा था, तो वहां का माहौल बेहद भारी था। लेकिन इंदिरा गांधी ने अपनी भावनाओं पर एक कठोर नियंत्रण पा लिया था। उन्होंने वहां विलाप करने के बजाय, सबसे पहले संजय के व्यक्तिगत सामान की जांच की। उन्होंने संजय की जेबों को टटोलना शुरू किया।”

नैयर के अनुसार, इंदिरा गांधी किसी भी कीमत पर उस चाबियों के गुच्छे को अपने कब्जे में लेना चाहती थीं, इससे पहले कि वो किसी और के हाथ लगे। दरअसल, उन चाबियों में संजय गांधी के उन गुप्त लॉकरों का एक्सेस था, जहां मारुति प्रोजेक्ट से जुड़ी वित्तीय फाइलें, पार्टी का गुप्त फंड और कई दिग्गज राजनेताओं के काले चिट्ठे रखे थे।
गांधी परिवार में ‘शीतयुद्ध’ की शुरुआत
इस रहस्य की दूसरी सबसे मजबूत कड़ी जुड़ती है पुपुल जयकर की किताब से। पुपुल, इंदिरा गांधी की बेहद करीबी सहेली थीं। उन्होंने अपनी किताब ‘Indira Gandhi: An Intimate Biography’ में संजय गांधी की मौत के बाद 1 सफदरजंग रोड (प्रधानमंत्री निवास) के भीतर की जो कहानी बताई है, वो इस चाबी के रहस्य को एक नया मोड़ देती है।
पुपुल जयकर के मुताबिक, संजय की मौत के तुरंत बाद ही गांधी परिवार के भीतर एक भयानक ‘शीतयुद्ध’ शुरू हो गया था। यह युद्ध था—संजय गांधी की राजनीतिक विरासत और उनके गुप्त दस्तावेजों पर कब्जे का।
- एक तरफ थीं: प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी
- दूसरी तरफ थीं: संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी

इंदिरा गांधी को डर था कि संजय की मौत के बाद उनके पास मौजूद बेहद संवेदनशील कागजात और चाबियां मेनका गांधी या उनके परिवार के हाथ न लग जाएं। अस्पताल से चाबियां मिलने के बाद, इंदिरा गांधी ने अपने सबसे भरोसेमंद विशेष सचिव आर.के. धवन और सुरक्षाकर्मियों को आदेश दिया कि संजय गांधी के कार्यालय, उनकी अलमारियों और उनके पर्सनल कमरों को तुरंत सील कर दिया जाए। संजय की हर एक फाइल, डायरी और तिजोरी को इंदिरा गांधी ने अपने सीधे नियंत्रण में ले लिया और मेनका गांधी को उनसे पूरी तरह दूर कर दिया गया।
तिजोरी में बंद थे कौन से राज?
संजय की इस खुफिया चाबी को लेकर इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक कई दावे करते हैं:
- मारुति प्रोजेक्ट और सीक्रेट फंड: मारुति प्रोजेक्ट के लिए कांग्रेस ने देश-विदेश के बड़े-बड़े घरानों से भारी-भरकम फंड लिया था। माना जाता है कि उस चाबी से खुलने वाले लॉकर में उन सभी उद्योगपतियों के नाम, गुप्त बैंक खातों के नंबर और करोड़ों रुपये के स्विस बैंक या अघोषित संपत्ति के दस्तावेज थे।
- नेताओं की जासूसी का रिकॉर्ड: संजय की चाबी को लेकर यह भी कहा जाता है कि उनके लॉकर में 1975 से 1977 (आपातकाल) के बीच विपक्षी नेताओं और खुद कांग्रेस के ही मंत्रियों की जासूसी के दस्तावेज थे। इसके दम पर संजय पूरी सत्ता को अपनी उंगलियों पर नचाते थे।
इंदिरा गांधी को अस्पताल में ही संजय की वो खुफिया चाबी मिल गई थी। इसके बाद लॉकर खोले गए, फाइलें ठिकाने लगाई गईं और वक्त के साथ वो सारे राज इतिहास के मलबे के नीचे दफन हो गए। लेकिन आज भी, जब भी भारतीय राजनीति के सबसे रहस्यमयी हादसों की बात होती है, तो आरएमएल अस्पताल का वो मंज़र लोगों के जहन में कौतूहल पैदा कर देता है।
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