भारत में रहना है तो वंदे मातरम् कहना होगा, शुभेंदु के इस बयान से हिला गया मुस्लिम समुदाय

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Suvendu Adhikari

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पश्चिम बंगाल में राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर बड़े बदलावों का सिलसिला जारी है। राज्य की नई सरकार ने अब राष्ट्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ा प्रशासनिक निर्णय लिया है। राज्य सरकार ने पश्चिम बंगाल के सभी सरकारी व निजी स्कूलों के साथ-साथ मदरसों में भी ‘वंदे मातरम’ (राष्ट्रीय गीत) का गायन अनिवार्य कर दिया है।

सरकारी आदेश के अनुसार, अब सभी शिक्षण संस्थानों में सुबह की प्रार्थना सभा के दौरान पूरे राष्ट्रीय गीत का ससम्मान गायन किया जाना आवश्यक होगा। इस आदेश के बाद सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो भी सामने आ रहे हैं, जहां विभिन्न विद्यालयों में छात्र राष्ट्रगीत गाते नजर आ रहे हैं।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने जताया विरोध

सरकार के इस आदेश के जारी होते ही इस पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं। ‘ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ (AIMPLB) ने इस फैसले पर गहरी चिंता व्यक्त की है। बोर्ड ने सरकार से इस आदेश को वापस लेने या फिर मुस्लिम छात्रों को धार्मिक मान्यताओं का हवाला देते हुए इससे छूट देने की मांग की है। विपक्ष और कुछ संगठनों का मानना है कि इस तरह के फैसले प्रशासनिक अनिवार्यताओं से अधिक वैचारिक एजेंडे से प्रेरित हैं।

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का कड़ा रुख: “राष्ट्रीय गीत का सम्मान सर्वोपरि”

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य संगठनों के विरोध के बीच मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सरकार के इस फैसले का पुरजोर बचाव किया है। उन्होंने कड़े शब्दों में स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय प्रतीकों और गीतों का सम्मान करना देश के हर नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य है।

मुख्यमंत्री ने अपने बयान में कहा:

“यदि आप इस देश में रहना चाहते हैं तो आपको ‘वंदे मातरम’ और ‘जन गण मन’ कहना होगा। आपको 26 जनवरी और 15 अगस्त जैसे राष्ट्रीय पर्वों का सम्मान करना होगा। यह भारतीय संस्कृति है, यह हमारी साझी सनातन संस्कृति है। भारत को हिंदुस्तान और इंडिया दोनों के रूप में जाना जाता है, और यह देश किसी भी राष्ट्रविरोधी या विभाजनकारी सोच के हाथों में नहीं जा सकता।”

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और ‘सेक्युलरिज्म vs कम्युनलिज्म’ की बहस

इस निर्णय को केवल एक प्रशासनिक आदेश के तौर पर नहीं, बल्कि राज्य में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को पुनर्जीवित करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। पूर्व में कई बार ऐसे विवाद सामने आए हैं जब कुछ नेताओं या संगठनों ने ‘भारत माता की जय’ या ‘वंदे मातरम’ कहने पर आपत्ति जताई है। ऐसे में बंगाल सरकार का यह कदम कानून और व्यवस्था के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने की दिशा में एक कड़ा संदेश माना जा रहा है।

इसके साथ ही, मुख्यमंत्री ने देश में जारी ‘नामकरण’ और धर्मनिरपेक्षता की बहस पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने देश और इंडिया के नाम को लेकर चल रहे विमर्श को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण बताया। मुख्यमंत्री के समर्थकों और विचारकों का यह भी तर्क है कि जब कोई मुख्यमंत्री मस्जिद या दरगाह जाता है, तो उसे ‘सेक्युलरिज्म’ (धर्मनिरपेक्षता) का प्रतीक माना जाता है, लेकिन जब वही मुख्यमंत्री सनातन परंपरा और राष्ट्रीय गौरव की बात करता है, तो उसे ‘कम्युनलिज्म’ (सांप्रदायिकता) का चश्मा पहनाना दोहरे मानदंडों को दर्शाता है।

पश्चिम बंगाल सरकार के इस ऐतिहासिक और कड़े फैसले को आप किस नजरिए से देखते हैं? क्या शिक्षण संस्थानों में राष्ट्रगीत अनिवार्य करना राष्ट्रीय एकता के लिए सही कदम है?

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