भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर 600 KM का ‘डार्क जोन’, घुसपैठियों और तस्करों के लिए बना आसान रास्ता; BSF करेगी स्मार्ट फेंसिंग
नई दिल्ली: भारत और बांग्लादेश के बीच की अंतर्राष्ट्रीय सीमा दुनिया की सबसे लंबी और सबसे जटिल सीमाओं में से एक है। दोनों देशों के बीच कुल 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है, लेकिन इसका लगभग 600 किलोमीटर का इलाका आज भी सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। सुरक्षा की भाषा में इस इलाके को ‘डार्क जोन’ (Dark Zone) कहा जाता है, जो घुसपैठियों, अवैध प्रवासियों और तस्करों के लिए सबसे आसान प्रवेश द्वार बन गया है।
क्या है यह 600 KM का ‘डार्क जोन‘ और कहाँ है स्थित?
भारत-बांग्लादेश की सीमा भारत के पांच राज्यों (पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, मेघालय, असम और मिजोरम) से होकर गुजरती है। इसमें सबसे लंबी सीमा पश्चिम बंगाल (2,217 किलोमीटर) के साथ लगती है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस डार्क जोन का सबसे बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में है। राज्य की कुल सीमा में से करीब 1,600 किलोमीटर पर तो बाड़ लगाई जा चुकी है, लेकिन लगभग 550 से 600 किलोमीटर का हिस्सा अभी भी पूरी तरह खुला या असुरक्षित है। यह डार्क जोन मुख्य रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों में फैला है:
- मुर्शिदाबाद और मालदा: यहाँ गंगा और पद्मा जैसी नदियां बहती हैं, जहाँ पानी के तेज बहाव और बदलती मिट्टी के कारण पक्की बाड़ लगाना बेहद मुश्किल है।
- उत्तर और दक्षिण 24 परगना: सुंदरबन का दलदली इलाका और इछामती नदी इस क्षेत्र को बेहद संवेदनशील बनाती है।
- कूचबिहार और जलपाईगुड़ी: यहाँ कई ऐसे गाँव हैं जो बिल्कुल जीरो लाइन (अंतर्राष्ट्रीय सीमा) पर बसे हैं, जहाँ जमीन अधिग्रहण बड़ी समस्या है।
इसे ‘डार्क जोन‘ क्यों कहा जाता है?
इस संवेदनशील क्षेत्र में पर्याप्त फेंसिंग (बाड़बंदी) न होना सबसे बड़ी वजह है। इसके अलावा, भौगोलिक रूप से यह इलाका नदियों, घने जंगलों और दलदलों से भरा है। यहाँ रोशनी की भारी कमी है और मोबाइल नेटवर्क भी बेहद कमजोर रहता है। इन विपरीत परिस्थितियों का फायदा उठाकर सीमा पार से घुसपैठिया और तस्कर भारत में दाखिल होने की कोशिश करते हैं।
BSF की क्या है तैयारी?
इस खुली खिड़की को पूरी तरह सुरक्षित करने के लिए सीमा सुरक्षा बल (BSF) अब अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है। जिन जगहों पर पारंपरिक पक्की बाड़ लगाना असंभव है, वहाँ ‘स्मार्ट फेंसिंग’ (Smart Fencing) लगाई जा रही है। इसके तहत थर्मल इमेजर, इंफ्रारेड सेंसर, अंडरवाटर सोनार और अत्याधुनिक कैमरों का नेटवर्क तैयार किया जा रहा है, ताकि डार्क जोन में होने वाली हर संदिग्ध गतिविधि पर चौबीसों घंटे नज़र रखी जा सके।
