लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं: NEET पेपर लीक प्रदर्शन की आड़ में बिहार में उपद्रव
लोकतंत्र के लिए हिंसा कभी भी जायज़ नहीं होती। प्रदर्शन की आड़ में अगर आप हिंसा करते हैं, तो वह प्रदर्शन की आत्मा पर हमला होता है। हिंसा होते ही प्रदर्शन एक शव में तब्दील हो जाता है। और ऐसा ही हुआ बिहार में।
बिहार में कई जगहों पर NEET पेपर लीक को लेकर प्रदर्शन हो रहे थे और देखते-देखते वे प्रदर्शन हिंसा में तब्दील हो गए। छपरा, सिवान, पटना, भागलपुर और गोपालगंज में प्रदर्शन हिंसक हुए, जबकि कटिहार में प्रशासन ने समय रहते स्थिति पर क़ाबू पा लिया। यह बात आज इसलिए उठानी पड़ रही है क्योंकि दिल्ली के प्रदर्शन के बीच बिहार की हिंसा को भुला दिया गया।
अधिकारी पर हमला: छपरा का गंभीर मामला
बिहार के छपरा में ‘बिहार बंद’ के दौरान हुई हिंसा का एक गंभीर मामला सामने आया है। पथराव में घायल हुए रिविलगंज के प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) रितेश कुमार सिंह की पटना में सर्जरी की गई है। डॉक्टरों के मुताबिक ऑपरेशन सफल रहा है और फिलहाल उनकी हालत स्थिर है।
उनकी सर्जरी क्यों हुई? इसलिए क्योंकि उपद्रवी भीड़ ने प्रदर्शन की आड़ में छपरा को जलाने की कोशिश की और उसी दौरान रितेश कुमार सिंह के सिर पर पत्थर मार दिया गया, जिससे उन्हें गंभीर चोट लगी। चोट लगने के बाद आनन-फानन में उन्हें अस्पताल ले जाया गया। बाद में बेहतर इलाज के लिए उन्हें पटना रेफर किया गया, क्योंकि उनकी हालत ठीक नहीं थी।
पुलिस की कार्रवाई और गिरफ्तारियाँ
इस घटना के बाद पुलिस ने पूरे मामले की जांच तेज कर दी है। घटनास्थल के वीडियो, CCTV फुटेज और अन्य सबूतों के आधार पर पथराव में शामिल लोगों की पहचान की जा रही है। पुलिस का कहना है कि हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। बिहार पुलिस ने हिंसा और उपद्रव में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कदम उठाने शुरू कर दिए हैं और अभी तक 350 से ज़्यादा लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।
प्रदर्शन बनाम हिंसा: बड़े सवाल
अब लोग इस पर काउंटर करेंगे कि क्या प्रदर्शन करना जायज़ है? तो उत्तर है – बिल्कुल जायज़ है। लेकिन उस प्रदर्शन की आड़ में किसी अधिकारी पर हमला कर देना, सरकारी संपत्ति को नष्ट कर देना – यह कैसे जायज़ हो सकता है?
इसके पक्ष में कई तर्क आएंगे कि “सरकार उनकी नहीं सुन रही थी।” लेकिन अगर सरकार नहीं सुन रही थी, तो फिर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की अनुमति किसने दी?
बिहार में ‘बिहार बंद’ की आड़ में हिंसा हुई। अगर उस पर भी प्रशासन मुँह बंद करके बैठा रहता, तो लोग ही सवाल उठाते कि “अरे भाई, ऐसे कैसे प्रशासन सब कुछ नष्ट होने दे सकता है?” और जब प्रशासन कार्रवाई करने जाता है, तो उसी पर हमला होता है। इसका जवाब किसी के पास नहीं है। जंतर-मंतर से लेकर बिहार तक हिंसा हुई, लेकिन किसी के पास यह जवाब नहीं है कि सरकारी संपत्ति को क्यों नष्ट किया गया और पुलिस पर हमला क्यों किया गया। सामने सिर्फ़ कुतर्क हैं, और कुतर्क करके कभी तर्क को नहीं जीता जा सकता।
