NEET विवाद के बीच राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस: मंच पर मौजूद चेहरे और उठते बड़े सवाल
NEET पेपर लीक विवाद, प्रदर्शन और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की माँग के बीच राहुल गांधी ने 25 जुलाई को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के विजुअल्स को जब आप ध्यान से देखेंगे, तो आपको मंच पर कुछ लोग दिखाई देंगे। ये लोग JNU और DU के स्टूडेंट्स हैं, जिनमें से कई को वामपंथी छात्र बताया जाता है। इनमें दानिश अली, नेहा और अंजलि जैसे नाम शामिल हैं, जो उस दौरान वहाँ मौजूद थे।
इसी दौरान एक चेहरे पर विशेष ध्यान जाता है। वीडियो में राहुल गांधी के ठीक पीछे एक व्यक्ति हाथ में तिरंगा झंडा लिए खड़ा दिखाई देता है। चेहरे की पहचान और आगे की पड़ताल करने पर पता चलता है कि वह JNU के पूर्व छात्र N. Sai Balaji हैं। उनके LinkedIn प्रोफाइल के अनुसार, वह वर्तमान में JNU में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।
मंच पर मौजूदगी और अतीत के विवाद
हालाँकि, मुद्दा केवल यह नहीं है कि वह मौजूदा समय में किस पद पर हैं। असल मुद्दा यह है कि तिरंगा थामे खड़ा वह व्यक्ति घोर मोदी विरोधी और अफ़ज़ल गुरु का प्रशंसक बताया जाता है। जो व्यक्ति उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को मासूम बताता है और जिसे यह कहते सुना गया है कि “मोदी-शाह की यह तानाशाही है”, उसे राहुल गांधी अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में बुलाते हैं। उसी व्यक्ति के साथ खड़े होकर राहुल गांधी छात्रों के भविष्य और देश के लोकतंत्र की बातें कर रहे हैं।

आतंकवादियों या विवादित चेहरों को लेकर यह रवैया कोई पहली बार नहीं देखा गया है। साल 2016 में JNU कैंपस के भीतर भी ऐसा ही एक मामला सामने आया था। यह तो वामपंथी विचारधारा से जुड़ा पहलू हुआ, लेकिन कांग्रेस नेताओं के बयानों का इतिहास भी इसी कड़ी को जोड़ता है।

बयानों का इतिहास और आतंकवादियों के प्रति शब्दावली
राजनीतिक बयानों के इतिहास पर नज़र डालें तो राहुल गांधी द्वारा “मसूद अज़हर जी”, दिग्विजय सिंह द्वारा “हफ़ीज़ सईद साहब” और सुशील कुमार शिंदे द्वारा राज्यसभा में “श्री हफ़ीज़ सईद” कहने के मामले दर्ज हैं। इतना ही नहीं, साल 2011 में दिग्विजय सिंह की ओर से “ओसामा जी” कहा गया था, जबकि रणदीप सुरजेवाला को “अफ़ज़ल गुरु जी” कहते सुना गया। राहुल गांधी से लेकर सुरजेवाला तक, कांग्रेस के विभिन्न नेताओं पर आतंकवादियों का बचाव करने के आरोप लगते रहे हैं। यहाँ तक कि इंडियन मुजाहिदीन जैसे संगठन को भी इन नेताओं द्वारा सीधा आतंकवादी संगठन मानने में आनाकानी की जाती रही है।
इतिहास की यह धारा चाहे साल 2011 की हो या साल 2026 की, हर बार ये नेता उन लोगों के साथ या उनके पक्ष में खड़े पाए जाते हैं जिन्होंने देश के खिलाफ बातें की हैं। इसके बाद यह दलील दी जाती है कि “मोदी के खिलाफ बोलना देश के खिलाफ बोलना कैसे हो गया?”
निश्चित रूप से मोदी सरकार या किसी राजनीतिक नेता के खिलाफ बोलना देश के खिलाफ बोलना नहीं है। लेकिन आतंकवादियों को glorify करना, उनका महिमामंडन करना और उनके नाम के साथ “जी” या “साहब” जैसे सम्मानजनक शब्द लगाना निश्चित रूप से देशहित के खिलाफ है। आतंकवादियों की फाँसी को ‘न्यायिक हत्या’ (judicial death) करार देना पूरी तरह से गलत है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के इन विजुअल्स और मंच पर मौजूद चेहरों से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि राहुल गांधी और उनकी राजनीति को इस देश और यहाँ के युवाओं के भविष्य की वास्तव में कितनी चिंता है।
