पेपर लीक माफ़िया पर मोदी सरकार का बड़ा एक्शन: नए संशोधन बिल में 10 करोड़ जुर्माना और फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट का प्रावधान
Image : Sansad TV
अगर कोई आपसे कहे कि अब पेपर लीक कराने पर 10 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लग सकता है, जांच सिर्फ़ दो महीने में पूरी करनी होगी और मुकदमे का फैसला भी तीन महीने में आ सकता है… तो शायद आपको यकीन न हो। लेकिन यकीन कर लीजिए, क्योंकि मोदी सरकार ने पेपर लीक माफ़िया के ऊपर अपना बड़ा कदम उठा दिया है।
एक महीने से जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन जारी रहा। NEET पेपर लीक को लेकर खूब बावला काटा गया और मोदी सरकार की जवाबदेही पर सवाल खड़े किए गए। लेकिन सवाल खड़ा करना आसान है और जब सवाल खड़े हुए, तो जवाब भी आए। पीएम ने ख़ुद वीडियो संदेश के ज़रिए युवाओं से संवाद किया और पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि सरकार अब पेपर लीक माफ़िया के खिलाफ सख्त कदम उठाने वाली है।
संसद में पेश हुआ संशोधन बिल
सोमवार, 27 जुलाई को लोकसभा में The Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Amendment Bill, 2026 पेश कर दिया गया। जब यह बिल सदन में आया, तो खूब हंगामा देखने को मिला, लेकिन हंगामे से परे इस बिल के प्रावधानों को समझना बेहद ज़रूरी है।
साल 2024 में मोदी सरकार ने The Public Examinations (Prevention of Unfair Means) Act लाया था, लेकिन अब उसी कानून को और अधिक सख्त बनाने के लिए यह संशोधन किया जा रहा है।
सजा और जुर्माने में बड़ा बदलाव
पहले अगर कोई व्यक्ति पेपर लीक या इस कानून के तहत किसी दूसरे अपराध में दोषी पाया जाता था, तो उसे कम से कम 3 साल और अधिकतम 5 साल की जेल हो सकती थी, साथ ही 10 लाख रुपये तक का जुर्माना लगता था। अब सरकार इसे बढ़ाकर कम से कम 5 साल और अधिकतम 10 साल की जेल करना चाहती है, जबकि जुर्माना भी बढ़ाकर 50 लाख रुपये तक कर दिया गया है।
अगर परीक्षा आयोजित कराने वाली किसी एजेंसी यानी सर्विस प्रोवाइडर की भूमिका सामने आती है, तो पहले उस पर 1 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता था और उसे चार साल तक किसी भी सार्वजनिक परीक्षा से दूर रखा जा सकता था। अब जुर्माना बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये कर दिया गया है और प्रतिबंध की अवधि भी चार साल से बढ़ाकर आठ साल कर दी गई है। इसके अलावा, अगर कंपनी के डायरेक्टर या वरिष्ठ अधिकारी भी इसमें शामिल पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ भी पहले से ज़्यादा सख़्त कार्रवाई होगी।
संगठित तरीके से पेपर लीक कराने वाले गैंग या नेटवर्क के लिए भी कानून और सख्त किया गया है। पहले ऐसे मामलों में न्यूनतम 5 साल की जेल और कम से कम 1 करोड़ रुपये जुर्माने का प्रावधान था। अब न्यूनतम सजा 7 साल और न्यूनतम जुर्माना 10 करोड़ रुपये कर दिया गया है।
त्वरित जांच और स्पेशल फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट
सरकार ने सिर्फ़ सजा और जुर्माना ही नहीं बढ़ाया है, बल्कि जांच और सुनवाई की प्रक्रिया को भी तेज़ करने का पूरा खाका तैयार किया है। केंद्र सरकार CBI के अलावा एक Special Task Force भी बना सकेगी और उसी से जांच करवा सकेगी।
अब हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से सलाह लेकर Special Fast Track Court बना सकेगा। इन अदालतों में मामलों की रोज़ाना सुनवाई होगी और कोशिश होगी कि चार्जशीट दाखिल होने के तीन महीने के भीतर फैसला आ जाए। इन मामलों की पैरवी के लिए सरकार Special Public Prosecutor भी नियुक्त करेगी।
वहीं, अगर किसी पक्ष को अदालत का फैसला मंजूर नहीं होता, तो वह हाई कोर्ट की दो जजों की बेंच में अपील कर सकेगा। यह अपील 30 दिनों के भीतर करनी होगी, हालांकि पर्याप्त कारण होने पर हाई कोर्ट 90 दिनों तक की देरी को स्वीकार कर सकता है।
निष्कर्ष
यह महज़ एक बिल नहीं है, बल्कि पेपर लीक माफ़िया को जड़ से ख़त्म करने का एक मजबूत प्रयास है। किसी ने व्यक्तिगत स्तर पर पेपर लीक किया हो या गड़बड़ी की हो, किसी सर्विस प्रोवाइडर ने लीक या गड़बड़ी की हो, सर्विस प्रोवाइडर के पर्सन-इन-चार्ज ने ऐसा किया हो या फिर किसी संगठित माफ़िया के ज़रिए यह सब हुआ हो—किसी को बख्शा नहीं जाएगा।
बस अब देखना यह होगा कि लोकसभा में इस बिल को लेकर कितना हंगामा होता है, क्योंकि विपक्ष एक सुर में हंगामा कर रहा है और बातचीत के लिए आगे नहीं आ रहा। बहरहाल, इस संशोधन बिल पर देश के युवाओं की क्या प्रतिक्रिया रहती है, सरकार उस पर भी अपनी नज़र बनाए रखेगी।
