मालदा की अदीना मस्जिद पर क्यों छिड़ा विवाद? शिवलिंग स्थापना की मांग से गरमाई राजनीति

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पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में स्थित करीब 650 साल पुरानी अदीना मस्जिद एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। इस बार विवाद की वजह कुछ हिंदू संगठनों की वह मांग है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि यह स्थल मूल रूप से भगवान आदिनाथ का प्राचीन मंदिर था। इसी मांग को लेकर इलाके में धार्मिक गतिविधियां तेज हो गई हैं और मामला अब राजनीति से लेकर प्रशासन तक पहुंच चुका है।


शिवलिंग स्थापना के ऐलान से शुरू हुआ नया आंदोलन

‘आदिनाथ पुरातन शिव मंदिर’ संगठन ने अदीना स्मारक के बाहर 3.6 फीट ऊंचा और करीब 1.5 टन वजनी शिवलिंग स्थापित करने की घोषणा की है। संगठन का कहना है कि यह शिवलिंग तारकेश्वर से मालदा लाया जा रहा है और पूरी प्रक्रिया कानून के दायरे में रहकर की जाएगी। संगठन से जुड़े लोगों का दावा है कि अदीना परिसर में आज भी हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां, नक्काशी और मंदिर शैली के कई स्थापत्य अवशेष मौजूद हैं।


संगठन आखिर क्या मांग कर रहा है?

संगठन का कहना है कि अदीना परिसर के इतिहास की वैज्ञानिक और पुरातात्विक जांच कराई जानी चाहिए। उनका दावा है कि यदि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) विस्तृत सर्वे कराए तो इस स्थल के पुराने इतिहास से जुड़े कई तथ्य सामने आ सकते हैं। साथ ही संगठन का कहना है कि उनका आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से चलाया जाएगा।


प्रशासन ने क्या कहा?

मामले को देखते हुए मालदा पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी है। प्रशासन ने साफ किया है कि अदीना स्मारक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में आने वाला एक केंद्रीय संरक्षित स्मारक है। इसलिए स्मारक के भीतर किसी भी प्रकार की पूजा-पाठ या धार्मिक गतिविधि की अनुमति नहीं दी जा सकती। अधिकारियों ने आयोजकों को निर्देश दिया है कि यदि कोई धार्मिक कार्यक्रम किया जाता है तो वह संरक्षित परिसर के बाहर ही होगा।


संसद तक पहुंचा मामला

अदीना मस्जिद का मुद्दा अब संसद तक पहुंच चुका है। भाजपा के राज्यसभा सांसद समिक भट्टाचार्य ने संसद में इस विषय को उठाते हुए केंद्र सरकार और ASI से मामले की जांच कराने तथा स्थल के इतिहास का अध्ययन करने की मांग की है। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों ने भाजपा पर इस मुद्दे के राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप लगाया है।


यूसुफ पठान की पोस्ट से क्यों मचा विवाद?

विवाद उस समय और बढ़ गया जब सांसद यूसुफ पठान ने अदीना स्मारक का दौरा कर उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं और इसे 14वीं सदी की ऐतिहासिक मस्जिद बताया। इसके बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने उनकी पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए दावा किया कि उन्होंने इस स्थल के कथित हिंदू इतिहास का उल्लेख नहीं किया। इसके बाद यह मामला सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बन गया।


इतिहास को लेकर क्या है विवाद?

इतिहासकारों के अनुसार अदीना मस्जिद का निर्माण 14वीं शताब्दी में बंगाल सल्तनत के सुल्तान सिकंदर शाह के शासनकाल में हुआ था। वहीं कुछ शोधकर्ताओं का मत है कि इसके निर्माण में पहले से मौजूद हिंदू और बौद्ध संरचनाओं के पत्थरों, स्तंभों और अन्य स्थापत्य सामग्री का उपयोग किया गया था। हालांकि यह प्रश्न कि क्या पूरा ढांचा किसी प्राचीन आदिनाथ मंदिर को तोड़कर बनाया गया था, आज भी इतिहासकारों और कानूनी मंचों पर विवाद का विषय बना हुआ है।


अब आगे क्या होगा?

फिलहाल अदीना मस्जिद का मामला धार्मिक आस्था, इतिहास, पुरातत्व और राजनीति के केंद्र में है। हिंदू संगठन इस मामले में आगे कानूनी लड़ाई लड़ने की बात कह रहे हैं, जबकि प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर जोर दे रहा है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि आने वाले दिनों में ASI, प्रशासन और अदालत इस पूरे विवाद पर क्या रुख अपनाते हैं।

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