जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, लेकिन हैदराबाद से आई ऐसी खबर जिसने बदल दी तस्वीर! भारत ने रच दिया अंतरिक्ष में इतिहास
एक तरफ़ दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवाओं के नाम पर प्रदर्शन हो रहा है। कहा जा रहा है कि इस सरकार ने युवाओं का भविष्य बर्बाद कर दिया। लेकिन वहीं, दिल्ली से कुछ किलोमीटर दूर हैदराबाद के युवाओं ने ऐसा इतिहास रच दिया, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान भारत की ओर खींच लिया।
ज़रा एक बात बताइए… आपने SpaceX का नाम तो ज़रूर सुना होगा। और कभी न कभी आपके मन में भी यह सवाल आया होगा कि आखिर भारत की अपनी कोई प्राइवेट स्पेस कंपनी कब दुनिया में SpaceX जैसी पहचान बनाएगी?
तो जंतर-मंतर के शोर के बीच 18 जुलाई को भारत ने वह कर दिखाया, जिसका इंतज़ार कई वर्षों से था।
पहली बार किसी भारतीय निजी कंपनी ने अपना बनाया हुआ ऑर्बिटल रॉकेट सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में भेज दिया। इस रॉकेट का नाम है विक्रम-1। इसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया, जहाँ निजी कंपनियाँ अपने दम पर ऑर्बिटल लॉन्च करने में सफल हुई हैं।
इस ऐतिहासिक मिशन का नाम था “मिशन आगमन”।
श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से उड़ान भरने वाले विक्रम-1 ने तय समय के भीतर अपना पेलोड Low Earth Orbit (LEO) में स्थापित कर दिया। यह भारत का पहला निजी ऑर्बिटल-क्लास लॉन्च व्हीकल है जिसने सफलतापूर्वक पृथ्वी की कक्षा तक पहुँचने का लक्ष्य हासिल किया।
लेकिन इस पूरी कहानी की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसके पीछे कोई सरकारी एजेंसी नहीं, बल्कि हैदराबाद की एक स्टार्टअप कंपनी Skyroot Aerospace है।
इस कंपनी की शुरुआत 2018 में दो पूर्व ISRO वैज्ञानिकों पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका ने की थी। दोनों ने ISRO की नौकरी छोड़कर एक ऐसा सपना देखा, जिसे उस समय कई लोगों ने लगभग असंभव माना था—भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट बनाना।
आज वही सपना हकीकत बन चुका है।
अगर आपको याद हो, तो 2022 में इसी कंपनी ने विक्रम-S नाम का सब-ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च कर इतिहास बनाया था। लेकिन विक्रम-1 उससे कई कदम आगे है, क्योंकि यह सीधे पृथ्वी की कक्षा तक पहुँचने वाला ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल है।
अब सवाल है कि यह उपलब्धि इतनी बड़ी क्यों मानी जा रही है?
क्योंकि अब तक भारत में ऑर्बिटल लॉन्च की जिम्मेदारी मुख्य रूप से ISRO निभाता था। विक्रम-1 की सफलता ने यह साबित कर दिया कि भारतीय निजी कंपनियाँ भी अब वैश्विक कमर्शियल लॉन्च मार्केट में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता रखती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत की स्पेस इकोनॉमी को नई रफ्तार मिलेगी और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के लिए भी भारत एक मजबूत लॉन्च डेस्टिनेशन बनकर उभरेगा।
इस मिशन में इस्तेमाल हुई तकनीक भी बेहद आधुनिक है।
विक्रम-1 को छोटे उपग्रहों को Low Earth Orbit (LEO) में स्थापित करने के लिए तैयार किया गया है। यह लगभग 350 किलोग्राम तक का पेलोड ले जाने में सक्षम है। इसमें कार्बन-कम्पोजिट स्ट्रक्चर और 3D-प्रिंटेड इंजन जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया है।
इस ऐतिहासिक सफलता के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी Skyroot Aerospace की पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि भारत के युवाओं पर भरोसा कीजिए, वे परिणाम देकर दिखाते हैं।
दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में कई बड़े नीतिगत बदलाव किए। 2020 में सरकार ने स्पेस सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया। इसके बाद IN-SPACe जैसे संस्थागत ढाँचे बनाए गए, जिनके जरिए स्टार्टअप्स को ISRO की सुविधाओं और तकनीकी सहयोग तक पहुँच मिली। इसी माहौल में Skyroot जैसी कंपनियाँ तेजी से आगे बढ़ीं।
आज विक्रम-1 की सफलता केवल एक कंपनी की उपलब्धि नहीं है। यह उन भारतीय इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और स्टार्टअप्स की जीत भी है, जिन्होंने यह साबित कर दिया कि भारत अब केवल सरकारी अंतरिक्ष मिशनों तक सीमित नहीं है, बल्कि निजी स्पेस इनोवेशन में भी वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है।
और जब विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग हुई, तो कई लोगों को राहुल गांधी का वह बयान भी याद आया, जिसमें उन्होंने “Make in India” को लेकर सवाल उठाए थे। अब समर्थकों का कहना है कि भारत की निजी स्पेस इंडस्ट्री की यह उपलब्धि “Made in India” की क्षमता का एक बड़ा उदाहरण है।
Skyroot Aerospace का लक्ष्य भी बेहद महत्वाकांक्षी है। कंपनी का कहना है कि वह अंतरिक्ष सेवाओं को आसान, तेज़ और सुलभ बनाना चाहती है। इसी वजह से वह खुद को स्पेस सेक्टर की “कैब सर्विस” के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रही है।
फिलहाल इतना तय है कि विक्रम-1 की यह उड़ान सिर्फ़ एक रॉकेट लॉन्च नहीं, बल्कि भारत के निजी अंतरिक्ष युग की नई शुरुआत मानी जा रही है।
