अमेरिका-ईरान दुश्मनी: क्या सिर्फ एक पेपर पर साइन करने से खत्म हो जाएगा 45 साल पुराना विवाद?
अगर आपके परिवार की किसी से 45 साल पुरानी दुश्मनी हो, तो क्या आपको लगता है कि वो किसी एक पेपर पर साइन करने मात्र से खत्म हो जाएगी? शायद नहीं। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे ऐतिहासिक तनाव का भी कुछ ऐसा ही हाल है। दशकों पुरानी इस नफरत की जड़ें इतनी गहरी हैं कि कोई भी समझौता इसे आसानी से खत्म नहीं कर पा रहा है। आइए समझते हैं कि कैसे दो पक्के दोस्त एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन गए।
1979 की इस्लामिक क्रांति
साल 1979 से पहले की बात करें, तो ईरान और अमेरिका पक्के दोस्त हुआ करते थे। ईरान में अमेरिका समर्थक राजा, यानी शाह पहलवी का शासन था। लेकिन 1979 में हुई ‘इस्लामिक क्रांति’ (Islamic Revolution) ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। शाह को देश छोड़कर भागना पड़ा और ईरान की सत्ता कट्टर धार्मिक नेता अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी के हाथों में आ गई। सत्ता संभालते ही खुमैनी ने अमेरिका को ‘ग्रेट सैटन’ यानी ‘बड़ा शैतान’ घोषित कर दिया। इसी गुस्से के बीच, ईरानी प्रदर्शनकारियों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास (US Embassy) पर हमला कर दिया और 52 अमेरिकी नागरिकों को पूरे 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा। बस, इसी एक घटना ने दोनों देशों के बीच नफरत की ऐसी दीवार खड़ी कर दी, जिसे आज तक कोई नहीं गिरा सका।
परदे के पीछे की दुश्मनी और परमाणु बम का डर
दूतावास संकट के बाद दशकों तक यह दुश्मनी परदे के पीछे चलती रही। इस बीच, ईरान ने चुपके-चुपके अपने परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Program) को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। अमेरिका और पश्चिमी देशों को डर था कि अगर ईरान के हाथ में परमाणु बम आ गया, तो पूरे पश्चिम एशिया (Middle East) की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। इस खतरे को भांपते हुए अमेरिका ने ईरान पर इतने कड़े आर्थिक प्रतिबंध (Economic Sanctions) लगा दिए कि ईरान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई।
एक उम्मीद जो अधूरी रह गई
साल 2015 में दुनिया ने एक बड़ा कूटनीतिक चमत्कार देखा। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ईरान के साथ मिलकर एक ऐतिहासिक ‘न्यूक्लियर डील’ यानी JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) साइन की। इस समझौते के तहत ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए तैयार हो गया और बदले में अमेरिका ने उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटा लिए। ऐसा लगा मानो अब हालात सुधर जाएंगे।
ट्रंप की एंट्री और पीठ में छुरा घोंपने की कहानी
लेकिन यह शांति ज्यादा दिन नहीं टिकी। साल 2018 में अमेरिका में सत्ता बदली और राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रंप। ट्रंप ने इस न्यूक्लियर डील को ‘इतिहास का सबसे खराब और वन-साइडेड समझौता’ करार दिया और अमेरिका को एक झटके में इस डील से बाहर कर दिया। ईरान ने इसे अपनी पीठ में छुरा घोंपने जैसा माना। पलटवार करते हुए ईरान ने भी समझौते की सभी शर्तों को तोड़ दिया और यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) को उस स्तर तक पहुंचा दिया, जो परमाणु बम बनाने के बेहद करीब माना जाता है।
मिडल ईस्ट में प्रॉक्सी वॉर और भरोसे की कमी
आज के मौजूदा हालातों की बात करें, तो गाजा में हमास का हमला हो, लेबनान में हिजबुल्लाह की रॉकेटबारी हो, या यमन के हूती विद्रोहियों का लाल सागर (Red Sea) में तांडव इन सबके पीछे कहीं न कहीं ईरान का ही हाथ माना जाता है। ईरान अपने इस ‘प्रॉक्सी नेटवर्क’ के जरिए अमेरिका के सबसे बड़े सहयोगी, इजरायल को घेर रहा है। यही वजह है कि अमेरिका और ईरान के बीच हुई वो अकेली न्यूक्लियर डील इस दुश्मनी को खत्म नहीं कर पाई। कूटनीति की दुनिया में समझौते तो हो जाते हैं, लेकिन जब तक दोनों देशों के बीच ‘भरोसे’ की बुनियादी कमी रहेगी, तब तक शांति की हर कोशिश अधूरी ही रहेगी।
