नेहरू की ‘आदिवासी पत्नी’ की कहानी: एक माला ने कैसे बदल दी 15 वर्षीय बुधनी की पूरी जिंदगी?

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क्या आपने कभी ‘नेहरू की आदिवासी पत्नी’ के बारे में सुना है?पहली बार सुनने पर यह दावा चौंकाने वाला लगता है। लेकिन जब इस कहानी की तह तक जाते हैं तो पता चलता है कि यह किसी प्रेम कहानी या विवाह की नहीं, बल्कि एक ऐसी आदिवासी लड़की की दर्दनाक दास्तान है, जिसे एक रस्म की अलग-अलग व्याख्या ने पूरी जिंदगी के लिए समाज से बेदखल कर दिया।

जब नेहरू पहुंचे पंचेत बांध के उद्घाटन में

साल 1959 में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू झारखंड (तत्कालीन बिहार) के धनबाद जिले में बने पंचेत बांध के उद्घाटन के लिए पहुंचे थे। उस दौर में बड़े-बड़े बांधों को आधुनिक भारत के विकास का प्रतीक माना जाता था और नेहरू उन्हें “आधुनिक भारत के मंदिर” कहा करते थे। उद्घाटन समारोह के दौरान नेहरू की इच्छा थी कि इस परियोजना पर काम करने वाले मजदूरों में से ही कोई व्यक्ति उद्घाटन में शामिल हो। इसी के बाद दमोदर वैली कॉर्पोरेशन ने वहां काम करने वाली एक 15 वर्षीय संथाल आदिवासी लड़की बुधनी मेझान का चयन किया।

एक माला जिसने सब कुछ बदल दिया

समारोह में बुधनी ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को तिलक लगाकर और फूलों की माला पहनाकर स्वागत किया। इसके जवाब में नेहरू ने भी वही माला बुधनी के गले में डाल दी। इसके बाद बुधनी ने नेहरू के साथ मिलकर बटन दबाकर पंचेत बांध का उद्घाटन किया। देशभर के अखबारों में इस ऐतिहासिक तस्वीर की चर्चा हुई। लेकिन बुधनी को नहीं पता था कि यही तस्वीर उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी बन जाएगी।

गांव लौटते ही बदल गई पूरी जिंदगी

समारोह के बाद जब बुधनी अपने गांव करबोना लौटीं, तो वहां उनका स्वागत नहीं बल्कि विरोध हुआ। संथाल समुदाय के कुछ पारंपरिक बुजुर्गों ने कहा कि किसी पुरुष को माला पहनाना और उसके द्वारा बदले में माला पहनाना विवाह का प्रतीक माना जाता है। चूंकि नेहरू संथाल समुदाय के नहीं थे, इसलिए पंचायत ने यह मान लिया कि बुधनी ने समुदाय से बाहर विवाह कर लिया है। इसके बाद पंचायत ने बुधनी को समाज से बहिष्कृत कर दिया। परिवार और गांव दोनों ने उनका साथ छोड़ दिया। इसी वजह से बाद में उन्हें “नेहरू की आदिवासी पत्नी” कहकर पुकारा जाने लगा, जबकि वास्तविकता में नेहरू और बुधनी के बीच कभी कोई विवाह नहीं हुआ था।

गांव छोड़ने को हुई मजबूर

सामाजिक बहिष्कार के बाद बुधनी को अपना गांव छोड़ना पड़ा। बाद के वर्षों में उन्हें दामोदर वैली कॉर्पोरेशन की नौकरी भी छोड़नी पड़ी और 1962 में उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। इसके बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल के पुरुलिया इलाके में मजदूरी और कोयला खदानों में काम करके अपना जीवन बिताया। वहीं उनकी मुलाकात सुधीर दत्ता से हुई, जिन्होंने कठिन समय में उनका साथ दिया।

26 साल बाद मिली राहत

करीब ढाई दशक तक संघर्ष करने के बाद बुधनी की कहानी तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक पहुंची। बताया जाता है कि 1985-86 के आसपास राजीव गांधी के हस्तक्षेप के बाद बुधनी को फिर से दामोदर वैली कॉर्पोरेशन में नौकरी मिली। हालांकि तब तक उनकी जवानी, उनका सामाजिक सम्मान और जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष संघर्ष में बीत चुके थे।

क्या नेहरू जिम्मेदार थे?

इस सवाल पर अलग-अलग राय मिलती है। उपलब्ध रिकॉर्ड बताते हैं कि यह पूरा विवाद संथाल समुदाय की स्थानीय परंपराओं और सामाजिक निर्णयों के कारण पैदा हुआ।हालांकि आलोचकों का यह भी कहना है कि जब यह घटना सामने आई, तब सरकार और प्रशासन ने बुधनी को पर्याप्त सुरक्षा या सामाजिक पुनर्वास नहीं दिया, जिसके कारण उन्हें दशकों तक कठिन जीवन जीना पड़ा।

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