पश्चिम बंगाल में सरकार बदलते ही बांग्लादेशी कट्टरपंथियों में हड़कंप, सीएम शुभेंदु अधिकारी के एक्शन से हिली ‘सल्तनत’

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पश्चिम बंगाल की राजनीतिक फिजा बदलने के साथ ही इसका सीधा असर पड़ोसी देश बांग्लादेश में भी देखने को मिल रहा है। राज्य में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की विदाई और भारतीय जनता पार्टी (BJP) की जीत के बाद से बांग्लादेश के कट्टरपंथी गुटों और नेताओं में भारी मायूसी और बौखलाहट देखी जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जो कट्टरपंथी तत्व पहले बंगाल में टीएमसी की जीत पर जश्न मनाते थे, वे अब राज्य की नई व्यवस्था से पूरी तरह हिल चुके हैं। बांग्लादेश की संसद से लेकर सड़कों तक, पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के फैसलों को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

बांग्लादेशी संसद में उठा मुद्दा

बांग्लादेश की सत्ता से शेख हसीना को बेदखल करने वाले आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक और वर्तमान सांसद नाहिद इस्लाम ने पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की कार्रवाइयों पर कड़ी आपत्ति जताई है। बांग्लादेशी संसद के भीतर आरोप लगाया गया है कि भारत की ओर से जबरन लोगों को सीमा पार धकेला जा रहा है। नाहिद इस्लाम का यह बयान सोशल मीडिया पर भी काफी वायरल हो रहा है, जिससे साफ है कि सीमा पर बढ़ते कड़े रुख से वहां का तंत्र परेशान है।

शुभेंदु सरकार का बड़ा एक्शन

इस बौखलाहट की असली वजह पश्चिम बंगाल की नई सरकार द्वारा अवैध घुसपैठ के खिलाफ उठाया गया कड़ा और अभूतपूर्व कदम है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा में आधिकारिक रूप से जानकारी दी है कि राज्य सरकार अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के अभियान में जुटी हुई है।

  • अवैध प्रवासियों पर कार्रवाई: अब तक 10,000 अवैध घुसपैठियों को चिन्हित कर बांग्लादेश वापस भेजा जा चुका है।
  • होल्डिंग सेंटर्स का निर्माण: 1,800 अतिरिक्त संदिग्धों को 12 अलग-अलग होल्डिंग सेंटरों में रखा गया है, जिन्हें कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद जल्द ही वापस डिपोर्ट किया जाएगा।
  • सुरक्षा व्यवस्था मजबूत: सीमा पर कड़ाई बढ़ाने के लिए राज्य सरकार ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) को 142 एकड़ जमीन आवंटित की है, ताकि घुसपैठ के रास्तों को पूरी तरह ब्लॉक किया जा सके।

पुरानी नीतियों पर सवाल: नई सरकार के समर्थकों का आरोप है कि पिछले 15 वर्षों के शासनकाल में इन घुसपैठियों को कथित तौर पर ‘वोट बैंक’ के रूप में इस्तेमाल किया गया। उन्हें अवैध रूप से राशन कार्ड, वोटर आईडी और आधार कार्ड जैसी सुविधाएं मुहैया कराई गईं, जिससे सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई थी।

इतिहास के दावों पर पलटवार

बांग्लादेशी सांसद नाहिद इस्लाम ने अपने बयान में ऐतिहासिक तथ्यों को मरोड़ते हुए दावा किया था कि कोलकाता शहर का निर्माण ‘ईस्ट बंगाल’ के पैसों से हुआ था और देश के विभाजन के लिए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जिम्मेदार थे। इस भ्रामक दावे का जवाब देते हुए इतिहासकारों और राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर 1971 में भारतीय सेना ने अपनी जान की बाजी न लगाई होती और भारतीय जवानों ने अपना खून न बहाया होता, तो आज दुनिया के नक्शे पर बांग्लादेश नाम का कोई स्वतंत्र देश ही नहीं होता। भारत की मदद के बिना वे तत्कालीन शासकों के दमन से मुक्त नहीं हो पाते। रही बात 1947 के विभाजन की, तो इसके लिए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी नहीं, बल्कि उस समय की तुष्टिकरण की नीतियां और अन्य प्रमुख राजनीतिक नेता जिम्मेदार थे।

डेमोग्राफी बदलने के खेल पर लगा विराम?

नई सरकार की इस सख्त सीमा नीति और लगातार जारी डिपोर्टेशन के कारण बंगाल के सीमावर्ती जिलों में पिछले कई वर्षों से चल रहे कथित जनसांख्यिकीय बदलाव (Demography Change) और बहुसंख्यक आबादी के पलायन के सिलसिले पर अब पूरी तरह से रोक लग गई है। इस्लामिक कट्टरपंथ का जो ताना-बाना बॉर्डर के इलाकों में बुना जा रहा था, उसे प्रशासनिक स्तर पर ध्वस्त किया जा रहा है।

यही कारण है कि ममता बनर्जी के सत्ता से बाहर होने का सबसे बड़ा झटका पश्चिम बंगाल से ज्यादा बांग्लादेश के उन तत्वों को लगा है जो भारत विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देते थे। अब सवाल यह उठता है कि क्या वाकई पूर्ववर्ती सरकार विदेशी और आंतरिक कट्टरपंथियों के दबाव में काम कर रही थी? क्या केवल वोट बैंक के लालच में देश की आंतरिक सुरक्षा को दांव पर लगा दिया गया था? इस पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं।

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