नागरवाला केस: जब एक फर्जी फोन कॉल ने हिला दी थी इंदिरा गांधी की सत्ता, 60 लाख की वो ठगी और रहस्यमयी मौतें
Nagarwala Scandal: 24 मई 1971, दोपहर के ठीक 12 बजकर 15 मिनट। दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट पर स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की मुख्य शाखा में एक फोन की घंटी बजती है। यह सिर्फ एक फोन कॉल नहीं था, बल्कि भारतीय इतिहास की एक ऐसी घटना की शुरुआत थी जिसने अगले कुछ ही घंटों में देश के लोकतंत्र, न्याय व्यवस्था और खुफिया तंत्र की धज्जियां उड़ाकर रख दीं।
इस एक कॉल के बाद रहस्यमयी मौतों का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ, जिसके राज आज 50 साल बाद भी इतिहास के पन्नों में दफन हैं। आखिर क्या था वह ‘नागरवाला घोटाला’, जिसने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को विवादों के घेरे में ला खड़ा किया था? आइए विस्तार से जानते हैं।
‘मैं इंदिरा गांधी बोल रही हूँ…’
मई 1971 का वह दौर था जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध के बादल मंडरा रहे थे। देश की कमान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हाथों में थी। पार्लियामेंट स्ट्रीट स्थित SBI की शाखा में चीफ कैशियर वेद प्रकाश मल्होत्रा अपनी कुर्सी पर बैठे थे, तभी फोन आया।
दूसरी तरफ से एक रौबदार आवाज गूंजी“मैं पी.एन. हक्सर बोल रहा हूँ, प्रधानमंत्री का प्रधान सचिव।” हक्सर ने मल्होत्रा से कहा कि देश की सुरक्षा से जुड़ा एक बेहद गोपनीय मिशन चल रहा है और बांग्लादेश की मदद के लिए तुरंत 60 लाख रुपये नकद चाहिए। जब मल्होत्रा ने बिना किसी लिखित वाउचर के इतनी बड़ी रकम देने में हिचकिचाहट दिखाई, तो फोन के दूसरी तरफ से एक महिला की आवाज आई:
“मल्होत्रा जी, मैं इंदिरा गांधी बोल रही हूँ। यह देश की सुरक्षा का मामला है। जैसा हक्सर साहब कह रहे हैं, वैसा तुरंत कीजिए। पैसे सूटकेस में भरकर हमारे कूरियर को सौंप दीजिए। वह आपको कोड वर्ड बताएगा। इसके बाद सीधे मेरे घर आइए, मैं आपको खुद रसीद दूँगी।”
प्रधानमंत्री का सीधा आदेश सुनकर मल्होत्रा के पास सोचने का वक्त नहीं था। वे तुरंत स्ट्रॉन्ग रूम गए और 100-100 के नोटों की गड्डियों से 60 लाख रुपये (जो आज के ज़माने में ₹200 करोड़ से भी ज़्यादा हैं) अपनी कार की डिक्की में रखे और बताए गए ठिकाने, चर्च रोड की तरफ निकल पड़े।
कोड वर्ड: ‘बांग्लादेश का बाबू’
चर्च रोड पर एक लंबा-चौड़ा, पारसी लुक वाला आदमी मल्होत्रा का इंतजार कर रहा था। कार रुकते ही उसने कोड वर्ड बोला ‘बांग्लादेश का बाबू’। जवाब में मल्होत्रा ने कहा ‘बार-एट-लॉ’। कोड मैच होते ही पैसे उस आदमी की टैक्सी में ट्रांसफर कर दिए गए।
पीएम आवास पहुंचते ही खुला ‘महाघोटाले’ का राज
पैसे सौंपने के बाद चीफ कैशियर वेद प्रकाश मल्होत्रा आधिकारिक रसीद लेने सफदरजंग रोड स्थित पीएम आवास पहुंचे। उन्होंने जब पी.एन. हक्सर से कहा कि पैसे डिलीवर हो चुके हैं, तो हक्सर के पैरों तले जमीन खिसक गई। हक्सर ने चिल्लाते हुए कहा— “कौन से पैसे? कैसा फोन? प्रधानमंत्री ने ऐसा कोई फोन नहीं किया!” मल्होत्रा सन्न रह गए; देश के सबसे सुरक्षित बैंक के साथ इतिहास की सबसे बड़ी ठगी हो चुकी थी।
कौन था रुस्तम सोहराब नागरवाला?
मामला सीधे प्रधानमंत्री से जुड़ा था, इसलिए दिल्ली पुलिस ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। कुछ ही घंटों में आरोपी को दिल्ली में उसके एक दोस्त के घर से गिरफ्तार कर लिया गया और उसके पास से ₹59 लाख से अधिक की रकम बरामद हुई।
इस सनसनीखेज ठगी को अंजाम देने वाले शख्स का नाम था रुस्तम सोहराब नागरवाला। नागरवाला कोई आम चोर नहीं था; वह भारतीय सेना में पूर्व कैप्टन रह चुका था और खुफिया एजेंसियों (RAW) के लिए भी काम कर चुका था।
बुलेट ट्रेन की रफ्तार से न्याय और रहस्यमयी मौतें
भारत में जहां छोटे मामलों की सुनवाई में सालों लग जाते हैं, वहीं नागरवाला के केस में कानून बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ा। नागरवाला ने कोर्ट में जुर्म कबूल करते हुए कहा कि उसने अकेले ही इंदिरा गांधी की मिमिक्री (आवाज की नकल) करके बैंक को ठगा था।
- 10 मिनट में फैसला: अदालत ने बिना किसी गवाह को बुलाए, बिना किसी गहन जांच के, मात्र 10 मिनट के भीतर नागरवाला को 4 साल की जेल की सजा सुना दी। इस जल्दबाजी ने देश के कानून विशेषज्ञों को हैरान कर दिया।
शुरू हुआ मौतों का सिलसिला
जेल जाने के बाद नागरवाला शांत नहीं बैठा। उसने ऊपरी अदालत में दोबारा सुनवाई की अपील की और तिहाड़ जेल से अखबारों को चिट्ठियां लिखकर दावा किया कि वह अदालत के सामने एक ऐसा सच खोलने वाला है जो देश की सरकार को हिलाकर रख देगा। लेकिन वह सच कभी सामने नहीं आ सका।
- SP डी.के. कश्यप की संदिग्ध मौत: इस केस की तहकीकात कर रहे दिल्ली पुलिस के तेजतर्रार अधिकारी एसपी डी.के. कश्यप, जो नागरवाला और बैंक के असली कनेक्शन को ढूंढ रहे थे, उनकी एक बेहद संदिग्ध सड़क दुर्घटना में मौत हो गई।
- नागरवाला को ‘हार्ट अटैक’: जैसे ही नागरवाला की दोबारा सुनवाई की तारीख नजदीक आई, मार्च 1972 में अस्पताल के भीतर रहस्यमयी तरीके से ‘हार्ट अटैक’ के कारण उसकी भी मौत हो गई।
‘रॉ’ (RAW) का सीक्रेट कनेक्शन
1977 में जब आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर हुईं, तो जनता पार्टी की सरकार ने इस केस की जांच के लिए ‘जस्तित जगनमोहन रेड्डी कमीशन’ का गठन किया। कमिटी ने माना कि नागरवाला अकेला नहीं था, बैंक के नियम टूटे थे और जांच को जानबूझकर दबाया गया था। वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश पात्रा और रशीद किदवई ने अपनी खोजी किताब ‘द स्कैम दैट शुक अ नेशन’ में इस पूरे स्कैंडल की परतों को गहराई से खंगाला है।

असलियत क्या थी?
दरअसल, वह 60 लाख रुपये बैंक का आम पैसा नहीं था, बल्कि वह इंदिरा गांधी की खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ (RAW) का वो सीक्रेट फंड था, जिसे बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान गुपचुप तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा था। बैंक के चीफ कैशियर को पहले से यह निर्देश थे कि जब भी PMO से कोई गुप्त कोड वर्ड आए, तो बिना किसी कागजी कार्रवाई के पैसे दे देने हैं। नागरवाला इसी खुफिया मिशन का एक हिस्सा था और वह इस लूपहोल को जानता था।
मोहरा या मास्टरमाइंड?
आज भी यह सवाल अनुत्तरित है कि कैप्टन नागरवाला सिर्फ एक मोहरा था या मास्टरमाइंड? क्या उसने सिर्फ लालच में आकर सिस्टम को धोखा दिया, या फिर सत्ता में बैठे लोग ‘रॉ’ के बहाने इन फंड्स का गलत इस्तेमाल कर रहे थे? अपनी साख बचाने के लिए इस पूरे मामले को आनन-फानन में एक ‘साधारण मिमिक्री और चोरी’ का रूप देकर रफा-दफा कर दिया गया। इन सारे सवालों के जवाब उन दो लाशों के साथ ही हमेशा के लिए दफन हो गए।
