संविधान हत्या दिवस: जब आधी रात को लगा था आपातकाल और बदल गई थी भारत की राजनीति
25 जून को देश में “संविधान हत्या दिवस” मनाया जाता है। यह दिन 1975 में लगाए गए उस आपातकाल की याद दिलाता है, जिसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के सबसे विवादित अध्यायों में गिना जाता है। केंद्र सरकार का मानना है कि इस दौरान संविधान की मूल भावना, नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों को गंभीर नुकसान पहुंचाया गया था।
आधी रात का फैसला, जिसने देश को चौंका दिया
25 जून 1975 की रात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। उस समय सरकार का तर्क था कि देश आंतरिक अशांति और राजनीतिक अस्थिरता का सामना कर रहा है। लेकिन आपातकाल लागू होते ही हालात तेजी से बदलने लगे।
विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई, जेलों में भर दिए गए हजारों लोग
आपातकाल की घोषणा के कुछ ही घंटों के भीतर जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई समेत विपक्ष के कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, आपातकाल के 21 महीनों के दौरान एक लाख से अधिक लोगों को गिरफ्तार या नजरबंद किया गया। इनमें राजनीतिक कार्यकर्ता, छात्र नेता, पत्रकार और सामाजिक संगठन से जुड़े लोग भी शामिल थे।
जब अखबारों की सुर्खियां सरकार तय करने लगी
आपातकाल का सबसे बड़ा असर मीडिया पर देखने को मिला। देशभर के समाचार पत्रों पर सेंसरशिप लगा दी गई। कई अखबारों को खबरें प्रकाशित करने से पहले सरकारी अधिकारियों की मंजूरी लेनी पड़ती थी। सरकार की आलोचना करने वाली खबरों को रोक दिया जाता था। भारतीय प्रेस के इतिहास में इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सबसे बड़े हमलों में से एक माना जाता है।
नसबंदी अभियान: आपातकाल का सबसे विवादित अध्याय
अगर आपातकाल की सबसे चर्चित और विवादित घटना की बात की जाए, तो वह था नसबंदी अभियान। जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर देशभर में बड़े पैमाने पर नसबंदी कराई गई। शाह आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 1975 से 1977 के बीच 1 करोड़ 7 लाख से अधिक नसबंदियां कराई गईं। रिपोर्ट में 1,774 मौतों और 548 अविवाहित लोगों की नसबंदी की शिकायतों का भी उल्लेख किया गया। कई जगहों पर सरकारी सुविधाओं और लाइसेंस को नसबंदी से जोड़ दिए जाने के आरोप भी लगे।
तुर्कमान गेट: जब घरों पर चले बुलडोजर
आपातकाल के दौरान दिल्ली का तुर्कमान गेट कांड भी काफी चर्चा में रहा। शहर सौंदर्यीकरण अभियान के तहत बड़ी संख्या में मकानों और झुग्गियों को हटाया गया। विरोध होने पर पुलिस कार्रवाई और फायरिंग की घटनाएं सामने आईं। कई परिवार बेघर हो गए और इस घटना ने सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए।
आखिर क्यों मनाया जाता है संविधान हत्या दिवस?
केंद्र सरकार का मानना है कि आपातकाल के दौरान नागरिकों के मौलिक अधिकार सीमित कर दिए गए, विपक्ष की आवाज दबा दी गई, प्रेस की स्वतंत्रता पर रोक लगाई गई और सरकारी शक्तियों का व्यापक इस्तेमाल किया गया। इन्हीं घटनाओं को याद करते हुए 25 जून को “संविधान हत्या दिवस” के रूप में मनाया जाता है, ताकि लोकतंत्र, संविधान और नागरिक स्वतंत्रता के महत्व को आने वाली पीढ़ियां समझ सकें।
भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा सबक
मार्च 1977 में आपातकाल समाप्त हुआ और चुनाव हुए। जनता ने मतदान के जरिए अपना फैसला सुनाया और देश में पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। आज, करीब पांच दशक बाद भी 25 जून भारतीय राजनीति के उस अध्याय की याद दिलाता है, जिसने यह सिखाया कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों, स्वतंत्र संस्थाओं और अभिव्यक्ति की आजादी से भी मजबूत होता है।
