कथनी और करनी का अंतर: राहुल गांधी का ‘छात्र प्रेम’ बनाम केरल में छात्रों पर बरसती लाठियां और वॉटर कैनन

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राहुल गांधी जब भी किसी चुनावी या राजनीतिक मंच पर आते हैं, तो उनके भाषणों के केंद्र में युवा, छात्र और देश की शिक्षा व्यवस्था होती है…

वे बड़े जोर-शोर से दावा करते हैं कि देश में छात्रों की आवाज दबाई जा रही है, युवाओं के साथ अन्याय हो रहा है और शिक्षा व्यवस्था को बचाने की जरूरत है। राजस्थान के कोटा में ‘छात्रों की गूंज संवाद’ जैसे आयोजनों के जरिए वे खुद को छात्रों का सबसे बड़ा हितैषी दिखाने का प्रयास करते हैं। लेकिन राजनीति का कड़वा सच तब सामने आता है जब उनकी अपनी ही सरकार के दौरान छात्रों की आवाज को पुलिस के बल पर कुचल दिया जाता है।

केरल में आई नव-निर्वाचित कांग्रेस (UDF) सरकार के कार्यकाल के दौरान जो तस्वीरें सामने आईं, उन्होंने कांग्रेस के इस ‘एजुकेशन नैरेटिव’ की पूरी तरह से हवा निकाल दी है।

केरल का सच: फीस बढ़ोतरी के खिलाफ प्रदर्शन और पुलिसिया दमन

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में सचिवालय के बाहर माहौल तब तनावपूर्ण हो गया, जब छात्र संगठन SFI और युवा सड़कों पर उतरे।

विरोध की वजह: केरल की सरकार द्वारा CAPE और IHRD जैसे तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षण संस्थानों में फीस में भारी बढ़ोतरी (लगभग 50% तक) कर दी गई है। प्रशासन का रवैया: जब छात्र इस आर्थिक बोझ और अन्याय के खिलाफ शांतिपूर्ण मार्च निकाल रहे थे, तो लोकतांत्रिक ढंग से बात सुनने के बजाय पुलिस ने उन पर बेरहमी से वॉटर कैनन (पानी की बौछारें) चलाईं और बल प्रयोग किया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में पुलिस और छात्रों के बीच तीखी धक्का-मुक्की और झड़प साफ देखी जा सकती है।

विपक्ष में रहते हुए छात्रों के हर आंदोलन को ‘लोकतंत्र की बुलंद आवाज’ बताने वाली कांग्रेस, सत्ता में आते ही उसी विरोध प्रदर्शन को ‘कानून-व्यवस्था की समस्या’ कैसे करार दे सकती है?

विरोधाभासी नीतियां: बच्चों की शिक्षा महंगी, शराब सस्ती!

केरल सरकार के हालिया बजट प्रस्तावों ने प्राथमिकताओं पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। विपक्षी दलों और आम जनता का आरोप है कि सरकार छात्रों पर फीस का बोझ बढ़ा रही है, जबकि दूसरी तरफ शराब नीति में ढील देकर टैक्स में भारी रियायत दी जा रही थी।

केरल सरकार के बजट में प्रस्तावित नई शराब नीति (Liquor Policy) के आंकड़े उनकी प्राथमिकताओं को पूरी तरह बेनकाब करते हैं:

0.5% से 10% अल्कोहल मात्रा: कम अल्कोहल वाले पेयों पर लगने वाले बिक्री कर (Sales Tax) को सीधे 251% से घटाकर केवल 120% कर दिया गया। 10% से 20% अल्कोहल मात्रा: इस श्रेणी में भी सरकार ने बड़ी राहत देते हुए टैक्स को 251% से कम करके 175% पर ले आया।

सोचिए, राजस्व (Revenue) के घाटे को पूरा करने के लिए सरकार का तर्क है कि शराब पर टैक्स कम कर दो ताकि बिक्री बढ़े, लेकिन दूसरी तरफ उसी राजस्व की भरपाई के लिए गरीब और मध्यमवर्गीय छात्रों की कॉलेज फीस बढ़ा दी जाए! हालांकि चौतरफा विरोध और अपनों के ही दबाव के बाद मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन को इस शराब टैक्स कटौती पर अस्थायी रूप से कदम पीछे खींचने पड़े हैं, लेकिन उनकी नीयत पर सवाल उठ चुके हैं।

राजनीतिक ‘इकोसिस्टम’ का दोहरा मापदंड

यही इस देश की राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है। अगर छात्रों पर लाठीचार्ज और वॉटर कैनन की यह घटना किसी भारतीय जनता पार्टी (BJP) शासित राज्य में हुई होती, तो अब तक:

राहुल गांधी सोशल मीडिया पर एक लंबा-चौड़ा पोस्ट लिख चुके होते। पवन खेड़ा और कांग्रेस प्रवक्ताओं की ओर से दो-तीन तीखी प्रेस कॉन्फ्रेंस हो चुकी होतीं। पूरा वामपंथी-कांग्रेसी इकोसिस्टम इसे ‘छात्रों के अधिकारों का हनन’ और ‘तानाशाही’ घोषित कर चुका होता।

लेकिन चूंकि यह घटना केरल में हुई है, जहां कांग्रेस समर्थित UDF की सरकार है, इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर एक रहस्यमयी चुप्पी पसरी हुई है। पूरा इकोसिस्टम इस तरह व्यवहार कर रहा है जैसे केरल में ‘सब चंगा सी’।

निष्कर्ष: छात्रों के कंधे पर राजनीतिक बंदूक

सौ बात की एक बात—यह पूरा घटनाक्रम यह साबित करने के लिए काफी है कि युवाओं, रोजगार और शिक्षा के प्रति कांग्रेस और राहुल गांधी की चिंता केवल चुनावी रैलियों और भाषणों तक सीमित है। हकीकत में, वे केवल छात्रों और युवाओं के कंधों पर अपनी राजनीतिक बंदूक रखकर चलाना चाहते हैं। जब खुद पर जिम्मेदारी आती है, तो प्राथमिकताएं बदल जाती हैं – शिक्षा महंगी हो जाती है और प्रशासन लाठियों के दम पर छात्रों की आवाज को खामोश करने में जुट जाता है।

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