NEET परीक्षा में लेट पहुंचे छात्रों को नहीं मिली एंट्री, ट्रैफिक जाम को लेकर कांग्रेस रैली पर उठे सवाल
NEET परीक्षा को लेकर देशभर में पहले ही कई तरह की बहस चल रही है। इसी बीच बेंगलुरु से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने सोशल मीडिया पर नई चर्चा छेड़ दी है। 21 जून को आयोजित NEET परीक्षा के दौरान तीन छात्र परीक्षा केंद्र तक समय पर नहीं पहुंच सके और उन्हें परीक्षा में शामिल होने की अनुमति नहीं मिली।
घटना के बाद छात्रों और उनके परिजनों के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए। वीडियो में छात्र रोते हुए दिखाई दिए और कई लोगों ने परीक्षा एजेंसी तथा व्यवस्था पर सवाल उठाने शुरू कर दिए।
हालांकि बाद में इस मामले में एक नया पहलू सामने आया, जिसके बाद बहस का केंद्र बदल गया।
ट्रैफिक जाम में फंसने का दावा
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, परीक्षा केंद्र पर पहुंचे कुछ अभिभावकों ने दावा किया कि कांग्रेस की एक रैली के कारण इलाके में भारी ट्रैफिक जाम लग गया था। इसी वजह से कई छात्र समय पर परीक्षा केंद्र नहीं पहुंच सके।
अभिभावकों का कहना था कि परीक्षा की तारीख काफी पहले से निर्धारित थी, ऐसे में उसी दिन बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों और रैलियों का आयोजन करने से छात्रों को परेशानी हुई।
परिजनों ने उठाए सवाल
घटना के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए कुछ अभिभावकों ने राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि यदि लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा हो रही थी, तो प्रशासन को ट्रैफिक प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना चाहिए था।
कुछ अभिभावकों ने यह भी कहा कि परीक्षा केंद्र पर पहुंचने के लिए उन्होंने समय से घर छोड़ा था, लेकिन रास्ते में लगे जाम के कारण वे निर्धारित समय सीमा के भीतर नहीं पहुंच पाए।
राहुल गांधी के कोटा कार्यक्रम की भी चर्चा
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सोशल मीडिया पर राहुल गांधी के हालिया “छात्रों की गूंज संवाद” कार्यक्रम को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई।
आलोचकों का कहना है कि हाल के दिनों में कांग्रेस नेतृत्व लगातार NEET और शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहा था। ऐसे में बेंगलुरु की घटना के बाद कुछ लोगों ने कांग्रेस और राज्य सरकार से भी जवाब मांगा कि परीक्षा वाले दिन रैली का आयोजन क्यों किया गया।
हालांकि कांग्रेस की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
सोशल मीडिया पर दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएं
घटना के बाद सोशल मीडिया दो हिस्सों में बंटा दिखाई दिया। एक वर्ग ने परीक्षा नियमों की सख्ती पर सवाल उठाए और कहा कि कुछ मिनट की देरी के कारण छात्रों का एक साल प्रभावित हो सकता है।
वहीं दूसरा पक्ष यह तर्क देता नजर आया कि राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं में समय सीमा का पालन सभी अभ्यर्थियों के लिए समान रूप से किया जाता है और नियमों में ढील देना निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है।
पीएम मोदी के एयरपोर्ट पर रुकने की चर्चा
इसी बीच सोशल मीडिया पर एक अन्य घटना की भी चर्चा होने लगी। कई पोस्ट्स में दावा किया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21 जून को दिल्ली पहुंचने के बाद कुछ समय तक एयरपोर्ट पर प्रतीक्षा की ताकि उनके सुरक्षा काफिले की वजह से परीक्षा देने जा रहे छात्रों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
हालांकि इस संबंध में विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पोस्ट्स का हवाला दिया जा रहा है और यह विषय भी व्यापक चर्चा का हिस्सा बना हुआ है।
परीक्षा और राजनीति पर नई बहस
बेंगलुरु की इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं के दौरान प्रशासनिक तैयारियों और ट्रैफिक प्रबंधन को कितना महत्व दिया जाना चाहिए।
फिलहाल परीक्षा से वंचित रह गए छात्रों और उनके परिजनों की नाराजगी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। वहीं राजनीतिक दलों और प्रशासन की भूमिका को लेकर भी सवाल पूछे जा रहे हैं।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मामले में राज्य सरकार, प्रशासन और राजनीतिक दलों की ओर से कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आती है या नहीं।
