द मित्रोखिन आर्काइव्स: क्या सोवियत खुफिया एजेंसी KGB के इशारों पर चलती थी इंदिरा गांधी की सरकार?
KGB Indira Gandhi Connection: साल 1992, मॉस्को की कड़कड़ाती ठंड के बीच एक बूढ़ा शख्स चुपचाप ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी MI6 के दफ्तर पहुंचता है। उसके हाथों में कोई साधारण सामान नहीं, बल्कि छह भारी-भरकम सूटकेस थे। उन सूटकेसों में दुनिया के सबसे खूंखार और रहस्यमयी जासूसी संगठन KGB (केजीबी) के वो सबसे काले राज दफन थे, जो अगर सार्वजनिक हो जाते तो दुनिया की महाशक्तियों के तख्तापलट हो सकते थे।
इस शख्स का नाम था वासिली मित्रोखिन, जो KGB का चीफ आर्काइविस्ट (मुख्य दस्तावेज़ संरक्षक) था। मित्रोखिन ने अपनी जान जोखिम में डालकर सोवियत संघ के टॉप-सीक्रेट ऑपरेशंस के नोट्स अपने जूतों में छिपाए और अपने विला के फर्श के नीचे गाड़ दिए थे।
लेकिन, मॉस्को के इस जासूस और उसके सूटकेसों का भारत से क्या संबंध था? साल 2005 में जब ये दस्तावेज एक किताब के रूप में दुनिया के सामने आए, तो इसमें किए गए दावों ने भारत की राजनीति में भूचाल ला दिया। दावों के मुताबिक, भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनकी सरकार का सोवियत संघ के सामने पूरी तरह सरेंडर था।
कोडनेम ‘VANO’: क्या इंदिरा गांधी को मिलती थी सोवियत फंडिंग?
मित्रोखिन ने अपनी डायरी और दस्तावेजों के आधार पर ‘The Mitrokhin Archive II: The KGB and the World’ नाम की किताब में दावा किया कि सोवियत खुफिया एजेंसी KGB ने इंदिरा गांधी को एक सीक्रेट कोडनेम दिया था VANO (वानो)।

किताब का सनसनीखेज दावा:
“KGB के जरिए कांग्रेस पार्टी और खुद इंदिरा गांधी के तंत्र तक भारी मात्रा में फंड पहुंचाया जाता था। यहां तक कि पूर्व केंद्रीय मंत्री एल.एन. मिश्रा को भी KGB से सीधे पैसे मिलते थे। केजीबी के एक शीर्ष अधिकारी ने एक बार गर्व से कहा था कि हमने भारत के प्रधानमंत्री के घर तक सूटकेस भरकर नोट पहुंचाए हैं और वे पैसे लेने से मना नहीं करती थीं।”
एक तरफ इंदिरा गांधी दुनिया के सामने ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ (Non-Aligned Movement) का नेतृत्व कर रही थीं, जिससे यह संदेश जाए कि भारत न अमेरिका के पाले में है और न रूस के। लेकिन इस किताब के मुताबिक, पर्दे के पीछे उनका झुकाव पूरी तरह सोवियत संघ की तरफ था और यह झुकाव सिर्फ विचारधारा का नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व को बचाए रखने के लिए मिल रही फंडिंग का नतीजा था।
भारतीय लोकतंत्र में KGB की गहरी पैठ
मित्रोखिन फाइल्स के अनुसार, भारत में KGB का ऑपरेशन सोवियत संघ का दुनिया में सबसे बड़ा और सबसे सफल ऑपरेशन था। इस खुफिया तंत्र ने भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को भीतर से खोखला करना शुरू कर दिया था:
- बिका हुआ मीडिया: 1970 के दशक में KGB ने भारत के लगभग 10 बड़े राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं को वित्तीय रूप से अपने प्रभाव में ले रखा था। पत्रकारों को मोटी रकम दी जाती थी ताकि वे अमेरिका के खिलाफ और सोवियत संघ के समर्थन में लेख लिखें। इसे सोवियत संघ का ‘सॉफ्ट प्रोपेगैंडा’ कहा गया, जिसका असर उस दौर की फिल्मों पर भी दिखा।
- मंत्रालयों में जासूसी: रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के शीर्ष अधिकारी कथित तौर पर KGB के एजेंट बन चुके थे। स्थिति यह थी कि भारत सरकार कोई भी बड़ी नीति या मिलिट्री डील साइन करती, उसकी कॉपी दिल्ली से पहले मॉस्को स्थित KGB हेडक्वार्टर पहुंच जाती थी।
पूर्व केजीबी जनरल ओलेग कालुगिन (Oleg Kalugin) ने भी अपने इंटरव्यू और संस्मरणों में इसकी पुष्टि की थी कि भारत में KGB की पैठ इतनी गहरी थी कि उन्होंने भारतीय दूतावासों और मंत्रालयों को पूरी तरह ‘पेनिट्रेट’ (भेद) कर लिया था।
आपातकाल (Emergency) और CIA का खौफ
25 जून 1975 को जब इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया, तो इस फैसले के पीछे भी कथित तौर पर सोवियत संघ की बड़ी भूमिका थी।
दस्तावेजों के मुताबिक, KGB लगातार इंदिरा गांधी को यह इनपुट दे रहा था कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA उनके खिलाफ साजिश रच रही है और उन्हें सत्ता से बेदखल करना चाहती है। इस खौफ के चलते इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाने का मन बनाया। सोवियत संघ ने इस तानाशाही फैसले का स्वागत किया और इसे ‘फासीवादी ताकतों के खिलाफ एक जरूरी कदम’ बताया। यही नहीं, सोवियत फंडिंग के दम पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी इस आपातकाल का खुलकर समर्थन किया था।
‘आयरन लेडी’ या परिस्थितियों की शिकार?
ये खुलासे एक बड़ा सवाल खड़े करते हैं। वो इंदिरा गांधी जिन्हें 1971 में अमेरिका की परवाह किए बिना पाकिस्तान के दो टुकड़े करने के लिए ‘आयरन लेडी’ कहा जाता है, क्या वे वाकई महाशक्तियों के खेल में एक मोहरा बन चुकी थीं?
R&AW के पूर्व अधिकारी बी. रमन ने अपनी किताब ‘The Kaoboys of R&AW’ में स्वीकार किया है कि शीत युद्ध (Cold War) के दौरान दिल्ली विदेशी खुफिया एजेंसियों का अखाड़ा बन चुकी थी। इंदिरा गांधी ने इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) और R&AW जैसी संस्थाओं को दरकिनार कर, PMO के कुछ खास सोवियत समर्थक अधिकारियों के जरिए फैसले लेना शुरू कर दिया था।
राजनीतिक प्रतिक्रिया और विवाद
साल 2005 में जब मित्रोखिन आर्काइव्स की यह किताब सार्वजनिक हुई, तो भारतीय संसद में भारी हंगामा हुआ। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और अन्य विपक्षी दलों ने इस पर न्यायिक जांच की मांग की थी। हालांकि, तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इन सभी दस्तावेजों को ‘मनगढ़ंत और बकवास’ बताकर पूरी तरह से खारिज कर दिया था। वहीं रूस ने भी हमेशा इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी।
