छात्र आंदोलन या टूलकिट 2.0? जंतर-मंतर पर ‘शाहीन बाग’ और ‘किसान आंदोलन’ वाला वही पुराना मॉडस ऑपरेंडी

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जंतर-मंतर पर पिछले तीन दिनों से जारी प्रदर्शन में जब अभिजीत दिपके का कोई भी हथकंडा काम नहीं आया, तो अब आंदोलन को नया मोड़ देने के लिए एक नया पैंतरा अपनाया जा रहा है। युवाओं और NEET परीक्षा के नाम पर जिस प्रदर्शन की शुरुआत की गई थी, अब उसमें ज़बरदस्ती किसानों को घसीटने की तैयारी है।

सोशल मीडिया पर अभिजीत दिपके द्वारा जारी किए गए हालिया वीडियो में वे सीधे तौर पर किसानों के सामने रोते और गुहार लगाते दिख रहे हैं। वीडियो में संदेश साफ है –“हम आपके आंदोलन के वक्त आपके साथ थे, ये छात्र आपके साथ थे, इसलिए अब हम चाहते हैं कि आप भी हमारे साथ जंतर-मंतर पर आइए।”

‘पीसफुल प्रोटेस्ट’ की आड़ में देश को सुलगाने की साज़िश?

यह केवल एक साधारण भावुक अपील नहीं है, बल्कि सीधे और साफ़ तौर पर एक ‘पीसफुल प्रोटेस्ट’ की आड़ लेकर इस पूरे प्रदर्शन को शाहीन बाग और पिछले किसान आंदोलन की हिंसक राह पर मोड़ने की एक सोची-समझी कोशिश है। अगर इतिहास पर नज़र डालें, तो यह क्रोनोलॉजी बिल्कुल शीशे की तरह साफ़ हो जाती है:

  • शाहीन बाग प्रदर्शन: CAA के नाम पर शुरू हुए इस प्रदर्शन को शुरुआती दिनों में ‘पीसफुल प्रोटेस्ट’ का ही नाम दिया गया था। लेकिन बाद में इसी नैरेटिव की आड़ में दिल्ली में भीषण हिंदू-विरोधी दंगे भड़काए गए।
  • पिछला किसान आंदोलन: यहाँ भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर देश ने भारी हिंसा देखी। गणतंत्र दिवस के पावन मौके पर लाल किले के ऊपर खालिस्तान के झंडे लहराए गए, पुलिसवालों के साथ बर्बरता से मारपीट की गई और ट्रैक्टर रैली निकालकर पूरे माहौल को हिंसक बनाया गया।

अब ठीक वही Modus Operandi (काम करने का तरीका) छात्रों के नाम पर हो रहे इस जंतर-मंतर प्रदर्शन में दोहराया जा रहा है, जहाँ अब किसानों को सम्मिलित करने की मांग की जा रही है।

नारों का चरित्र: उमर खालिद से लेकर RSS विरोध तक

इस प्रदर्शन की दो कड़ियों ने इसके असली एजेंडे को बेनकाब कर दिया है:

  1. पहले चरण में: प्रदर्शन के दौरान अचानक उमर खालिद और शरजील इमाम के पोस्टर लहराए गए और ‘आज़ादी-आज़ादी’ के देशविरोधी नारे लगे।
  2. दूसरे चरण में: अब इसी प्रदर्शन का रुख मोड़कर सीधे तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के खिलाफ ज़हरीली नारेबाज़ी की जा रही है।

अभिजीत दिपके मीडिया के कैमरों के सामने आकर तो इसे ‘छात्रों का प्रदर्शन’ बताते हैं, तो फिर सवाल उठता है कि छात्रों के हितों की आड़ में उमर खालिद के नामों का इस्तेमाल क्यों हो रहा है? देशविरोधी नारे क्यों लग रहे हैं? और इसमें किसानों को क्यों बुलाया जा रहा है? इसी बीच पंजाब के एक संगठन, भारतीय किसान यूनियन (BKU) ने तुरंत सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर इस प्रदर्शन को अपना समर्थन भी दे दिया है, जो इस पूरी साज़िश के अंतर्संबंधों को उजागर करता है।

समझिए टूलकिट की पूरी क्रोनोलॉजी

यह कोई अचानक उपजा आंदोलन नहीं, बल्कि एक प्रॉपर टूलकिट है।

याद करिए, किसान आंदोलन के वक्त भी यही हुआ था कि पश्चिम (West) में बैठे कथित बुद्धिजीवियों, इंटरनेशनल आर्टिस्ट्स और एक्टिविस्ट्स को एक सोची-समझी टूलकिट के ज़रिए इस आंदोलन से जोड़ा गया था। बाद में खुलासे हुए कि पीआर (PR) फर्म्स के ज़रिए उन्हें करोड़ों रुपये के फंड्स दिए गए थे।

इस नए प्रदर्शन के पीछे की छोटी सी क्रोनोलॉजी को समझना भी बेहद ज़रूरी है:

  • पहला कदम: चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) के एक बयान के बाद ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का गठन होता है।
  • दूसरा कदम: इसके तुरंत बाद NEET पेपर लीक का मामला सामने आते ही शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर चौतरफा हंगामा मचाया जाता है।
  • तीसरा कदम: सोशल मीडिया पर योजनाबद्ध तरीके से इस प्रोटेस्ट की हवा चलाई जाती है, जहाँ पहले फेज़ में उमर खालिद को नायक बनाया जाता है और दूसरे फेज़ में संघ (RSS) को गालियां दी जाती हैं।

निष्कर्ष: छात्रों का हित या भारत विरोधी एजेंडा?

साफ़ है कि जो देशविरोधी टूलकिट पिछले चार-पांच सालों से पूरी तरह ठप हो गई थी, जिसकी जड़ों को उखाड़ फेंका गया था, अब उसे नए सिरे से स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। मकसद छात्रों को न्याय दिलाना नहीं, बल्कि कैसे भी करके भारत में अशांति और अस्थिरता का माहौल पैदा करना है।

वरना, एक आम नागरिक को भी यह समझने की ज़रूरत है कि जो प्रदर्शन विशुद्ध रूप से छात्रों के भविष्य और उनके हितों के लिए है, उसमें किसान आकर क्या करेंगे? क्या यह वाकई छात्रों का आंदोलन है, या फिर भारत के खिलाफ रची जा रही किसी बहुत बड़ी अंतरराष्ट्रीय साज़िश का हिस्सा?

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