‘अग्निकन्या’ के उदय से ‘साम्राज्य’ के पतन तक: बंगाल की राजनीति में कैसे खुद को दोहरा रहा है इतिहास?

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90 का दशक और पश्चिम बंगाल की सड़कें। उस दौर में सूबे की सियासत पर केवल एक ही रंग हावी था, लाल। ज्योति बसु के नेतृत्व में वामपंथी मोर्चा (Left Front) एक ऐसे अभेद्य किले की तरह था, जिसे ढहाना तो दूर, चुनौती देने की सोचना भी राजनीतिक आत्महत्या माना जाता था। लेकिन इसी लाल समंदर के बीच, सूती साड़ी पहने और हवाई चप्पल चटकाए, एक 35 साल की महिला अपनी तेज आवाज के साथ उस अजेय सत्ता को सीधे ललकार रही थी। उनका नाम था ममता बनर्जी।

आज साल 2026 में जब बंगाल की राजनीतिक जमीन पूरी तरह बदल चुकी है, तब इतिहास के उन पन्नों को पलटना बेहद जरूरी हो जाता है जहां से तृणमूल कांग्रेस (TMC) की नींव पड़ी थी। यह कहानी सिर्फ एक नेता के उभार की नहीं है, बल्कि इसमें अपनी ही पार्टी के भीतर हुए सौदेबाजी और ‘फ्रेंडली मैच’ का वो स्याह सच भी शामिल है, जिससे आज की पीढ़ी अनजान है।

खूनी सुबह जिसने ‘अग्निकन्या’ को जन्म दिया

कोलकाता की उमस भरी सुबह। युवा कांग्रेस ने राज्य की वामपंथी सरकार की नीतियों, बढ़ती बेरोजगारी और पुलिसिया दमन के खिलाफ ‘कोलकाता बंद’ का एलान किया था। ममता बनर्जी उस समय युवा कांग्रेस की सूबेदार थीं और सड़कों पर डटी थीं। वे बखूबी जानती थीं कि कम्युनिस्ट शासन में सड़कों पर उतरने का अंजाम क्या होता है। वहां मुकाबला सिर्फ पुलिस की लाठियों से नहीं, बल्कि CPM के कैडर्स (पार्टी के लठैतों) से था।

दक्षिण कोलकाता का व्यस्त चौराहा हाजरा मोड़। ममता बनर्जी अपने मुट्ठी भर समर्थकों के साथ धरने पर बैठी थीं। तभी CPM की युवा शाखा (DYFI) के सैकड़ों कार्यकर्ता लाठियां, लोहे की रॉड और चेन लेकर उनकी तरफ बढ़े। पुलिस मूकदर्शक बनी खड़ी थी। समर्थकों ने ममता से भागने की मिन्नतें कीं, लेकिन वे पीछे नहीं हटीं।

इसी बीच, एक स्थानीय CPM नेता लालू आलम हाथ में लोहे की भारी रॉड लेकर आगे बढ़ा और उसने पूरी ताकत से ममता के सिर पर वार किया। आखिरी क्षण में ममता ने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाया, जिससे रॉड पहले उनकी कलाई पर लगी (हड्डी टूट गई) और फिर उनके माथे पर जा लगी। चारों तरफ सिर्फ खून था। ममता को गंभीर हालत में अस्पताल भर्ती कराया गया।

“इन्होंने मेरे शरीर को तोड़ा है, मेरी आत्मा को नहीं” अस्पताल में होश आने के बाद ममता बनर्जी के शब्द (शूतापा पॉल की किताब ‘Didi: The Untold Mamata Banerjee’ से इस हमले ने ममता बनर्जी को बंगाल की आम जनता की नजरों में ‘अग्निकन्या’ बना दिया। उनके सिर की वो सफेद पट्टी सालों तक बंगाल की रैलियों में CPM के पतन का सबसे बड़ा प्रतीक बनी रही।

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कांग्रेस और CPM का ‘फ्रेंडली मैच’ और ममता की बगावत

हाजरा मोड़ की घटना के बाद ममता बनर्जी का कद बहुत बड़ा हो चुका था। दिल्ली में बैठे प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी उनके मुरीद थे। लेकिन बंगाल कांग्रेस के भीतर उनके खिलाफ एक अलग ही चक्रव्यूह रचा जा रहा था।

उस दौर में बंगाल कांग्रेस के सर्वेसर्वा सोमेन मित्रा थे, जो ‘सूटकेस पॉलिटिक्स’ और बंद कमरों की बैठकों में यकीन रखते थे। वरिष्ठ पत्रकार डोला मित्रा अपनी किताब ‘Decoding Didi’ में इस आंतरिक कलह का खुलासा करती हैं। असल में, बंगाल कांग्रेस के बड़े नेताओं का मुख्यमंत्री ज्योति बसु के साथ एक गुप्त समझौता था, जिसे राजनीति में ‘फ्रेंडली मैच’ कहा जाता है। दिन में कांग्रेस नेता अखबारों में CPM के खिलाफ बयान देते थे और रात को उन्हीं नेताओं के साथ डिनर पर बैठकर अपनी सीटों और व्यापार की सेटिंग करते थे।

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ममता बनर्जी ने अपनी आत्मकथा ‘My Unforgettable Memories’ में इस दौर के अपने दर्द को बयां करते हुए लिखा है कि जब वे CPM के खिलाफ आंदोलन की बात करती थीं, तो उनकी ही पार्टी के नेता उन पर हंसते थे और दिल्ली जाकर उन्हें ‘अनुशासनहीन’ बताते थे।

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वो ऐतिहासिक बगावत:

अगस्त 1997 में जब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का राष्ट्रीय अधिवेशन कोलकाता में हो रहा था, तब ममता बनर्जी ने मुख्य मंच का बहिष्कार कर दिया। उन्होंने कुछ किलोमीटर दूर ब्रिगेड परेड ग्राउंड में अपनी समानांतर रैली बुलाई। मंच से अपनी सूती शॉल को हवा में लहराते हुए उन्होंने गरजकर कहा:

“सुन लो दिल्ली के नेताओं, यह कांग्रेस तुम्हारी बपौती नहीं है। तुमने बंगाल के स्वाभिमान को CPM के पैरों में गिरवी रख दिया है। अगर तुम बंगाल की आवाज नहीं सुन सकते, तो आज से मैं तुम्हारी इस बंद कमरों वाली कांग्रेस को खारिज करती हूं।”

इस बगावत के बाद, 22 दिसंबर 1997 को कांग्रेस ने ममता बनर्जी को पार्टी से निष्कासित कर दिया।

‘जोड़ा फूल’ का जन्म और संघर्ष का नया दौर

नए साल के पहले दिन, 1 जनवरी 1998 को कोलकाता के एक छोटे से कमरे में इतिहास लिखा गया। ममता बनर्जी ने अपने वफादार साथियों—मुकुल रॉय, अजीत पांजा और सौगत रॉय के साथ मिलकर नई पार्टी ‘अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस’ (TMC) की घोषणा की। बंगाली में ‘तृणमूल’ का मतलब होता है ‘Grassroots’ यानी घास की जड़ें, और पार्टी का सिंबल चुना गया ‘जोड़ा फूल’।

शुरुआती सफर बेहद दर्दनाक था। 2001 और 2006 के विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद राजनीतिक विश्लेषकों ने ममता का अंत मान लिया था। लेकिन साल 2006-2007 में जब बुद्धदेव भट्टाचार्य की CPM सरकार ने सिंगूर और नंदीग्राम में कारखानों के लिए किसानों की जमीनें जबरन छीनना शुरू किया, तो ममता फिर उठ खड़ी हुईं।

नंदीग्राम नरसंहार के खिलाफ उन्होंने कोलकाता के धर्मतल्ला में 26 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। इसी आंदोलन के बीच उन्होंने नारा दिया—“माँ, माटी, मानुष”। इस एक नारे ने कम्युनिस्टों के ‘वर्ग संघर्ष’ के नैरेटिव को ध्वस्त कर दिया। बंगाल के गरीब, मुस्लिम, दलित और किसान जो कभी वामपंथ का आधार थे, वे ममता के पीछे खड़े हो गए। परिणामस्वरुप, 13 मई 2011 को TMC गठबंधन ने 294 में से 227 सीटें जीतकर 34 साल पुराने ‘लाल दुर्ग’ को उखाड़ फेंका।

क्या इतिहास ने खुद को दोहरा दिया है?

आज 15 साल बाद, साल 2026 में बंगाल की राजनीति का चक्र पूरा घूम चुका है। जिस क्रूर सत्ता, कैडर राज और दमन के खिलाफ लड़कर ममता बनर्जी सत्ता में आई थीं, समय के साथ उनकी अपनी सरकार पर भी वैसे ही आरोप लगे। सत्ता को बचाए रखने के लिए किए गए समझौतों और प्रशासनिक क्रूरता ने आखिरकार वही मोड़ ला दिया जो कभी वामपंथियों का हुआ था।

आज बंगाल में दीदी की सत्ता को उखाड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार बना चुकी है। तृणमूल कांग्रेस का कुनबा बिखर रहा है और पार्टी लगभग टूट की कगार पर है। राजनीति की विडंबना देखिए बंगाल की जमीन पर आज भी कांग्रेस और तृणमूल के कार्यकर्ता आपस में लहूलुहान हो रहे हैं, लेकिन दिल्ली के गलियारों में सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की ‘झप्पी’ राजनीतिक प्राथमिकताओं को बदलती दिख रही है।

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