TMC Crisis: अभिषेक बनर्जी के आवास पर पुलिस की छापेमारी; क्या अंतर्कलह के बीच दांव पर है पार्टी का सिंबल और फंड?
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय दोहरे संकट से जूझती नजर आ रही है। एक तरफ जहां पार्टी के शीर्ष नेताओं पर केंद्रीय और राज्य की जांच एजेंसियों का शिकंजा कसता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी कलह अब खुलकर सामने आने लगी है। शनिवार को तड़के सुबह कोलकाता पुलिस और केंद्रीय बलों की एक संयुक्त टीम ने टीएमसी सांसद और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पर औचक छापेमारी की।
कालीघाट आवास पर 5 घंटे तक चला सर्च ऑपरेशन
प्राप्त जानकारी के अनुसार, पुलिस बल सुबह-सुबह अभिषेक बनर्जी के घर पहुंचा और मुख्य गेट का ताला तोड़कर भीतर दाखिल हुआ। यह कार्रवाई वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े एक मामले में अभिषेक बनर्जी के करीबी और उनके निजी सहायक (PA) सुमित रॉय की तलाश के सिलसिले में की गई थी।
इस छापेमारी की खबर मिलते ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी तुरंत अभिषेक के आवास पर पहुंच गईं। लगभग पांच घंटे तक चले इस सघन सर्च ऑपरेशन से नाराज अभिषेक बनर्जी ने मीडिया से बातचीत में तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा:
“आप इस तलाशी के बारे में सीधे जांच एजेंसियों से ही सवाल क्यों नहीं पूछते? क्या मैंने सुमित को अपने घर में छिपाकर रखा है? उन्होंने मेरे पूरे घर की तलाशी ले ली है।”
CID की पूछताछ और 14 जून का नया समन
यह छापेमारी ऐसे समय में हुई है जब इससे ठीक पहले पश्चिम बंगाल विधानसभा में हुए कथित फर्जी हस्ताक्षर मामले में राज्य की सीआईडी (CID) ने गुरुवार को अभिषेक बनर्जी से भवानी भवन में पांच घंटे से अधिक समय तक पूछताछ की थी।
सूत्रों के मुताबिक, इस लंबी पूछताछ के दौरान अभिषेक बनर्जी कई सवालों के संतोषजनक जवाब नहीं दे सके और कई मौकों पर उनका गुस्सा भी फूट पड़ा। इस मामले में कार्रवाई तेज करते हुए CID ने अब अभिषेक बनर्जी को 14 जून को दोपहर 12 बजे दोबारा पेश होने का कड़ा निर्देश जारी किया है।
पार्टी में अंतर्कलह: दांव पर लगा सिंबल और भारी-भरकम फंड
एक ओर जहां अभिषेक बनर्जी कानूनी शिकंजे में घिरते दिख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के भीतर सांगठनिक स्तर पर एक बड़ा तूफान खड़ा होता नजर आ रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि टीएमसी के भीतर का आंतरिक विवाद जल्द ही भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के दरवाजे तक पहुंच सकता है।
अगर पार्टी में औपचारिक रूप से विभाजन होता है, तो टीएमसी का प्रसिद्ध चुनाव चिह्न ‘जोड़ा घास फूल’ और पार्टी का विशाल फंड दोनों ही खतरे में पड़ सकते हैं। गौरतलब है कि आंध्र प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी टीडीपी (TDP) के बाद तृणमूल कांग्रेस देश की दूसरी सबसे अमीर क्षेत्रीय पार्टी है।
चुनाव आयोग और कानूनी पेचदगियां
पार्टी के भीतर वर्चस्व और सिंबल की इस लड़ाई में ‘सिंबल ऑर्डर’ का पैराग्राफ-15 और वर्ष 1972 का ऐतिहासिक ‘सादिक अली बनाम भारत निर्वाचन आयोग’ सुप्रीम कोर्ट का फैसला बेहद अहम भूमिका निभा सकते हैं।
- संपत्तियों पर नियंत्रण: कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी दल में फूट के दौरान पार्टी फंड, बैंक खातों और कार्यालयों जैसी भौतिक संपत्तियों पर नियंत्रण का फैसला सीधे चुनाव आयोग नहीं करता। यह मामला सिविल कोर्ट (दीवानी अदालतों) द्वारा पार्टी के संविधान के आधार पर तय किया जाता है।
- ECI के फैसले का असर: हालांकि, सिविल कोर्ट जाने का रास्ता काफी जटिल होता है, क्योंकि ‘असली तृणमूल कांग्रेस’ कौन है, इस पर चुनाव आयोग का जो भी फैसला आएगा, उसका सीधा और गहरा असर अदालती कार्यवाहियों पर भी पड़ेगा।
फिलहाल, निर्वाचन सदन (ECI) किसी भी पार्टी के आंतरिक विवाद का स्वतः संज्ञान (Suo Motu) नहीं लेता है। आयोग इस मामले में तब तक हस्तक्षेप नहीं करेगा जब तक कि टीएमसी का कोई गुट आधिकारिक तौर पर इसके लिए आयोग से संपर्क नहीं करता। ऐसे में अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या टीएमसी का यह अंदरूनी झगड़ा देश के चुनाव आयोग के सामने एक नया कानूनी युद्ध रूप लेगा।
