विदेशी मंच पर वामपंथी मीडिया ने उगला ज़हर, पीएम मोदी को लेकर फैलाया गया फेक न्यूज़
ओस्लो फ्रीडम फोरम फाइल इमेज
भारत में मीडिया की निष्पक्षता और राजनीतिक झुकाव को लेकर बहस कोई नई बात नहीं है।लेकिन वामपंथी मीडिया ने इस झुकाव को चरणवंदन में तब्दील कर दिया है। लेकिन हाल ही में नॉर्वे में आयोजित Oslo Freedom Forum में दिए गए एक भाषण के बाद यह बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इस बार चर्चा के केंद्र में हैं Scroll.in की एग्जीक्यूटिव एडिटर सुप्रिया शर्मा, जिनके भाषण को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
Oslo Freedom Forum में क्या कहा गया?
Oslo Freedom Forum में अपने संबोधन के दौरान सुप्रिया शर्मा ने भारत में पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और असहमति रखने वाले लोगों की स्थिति पर चिंता व्यक्त की। अपने प्रस्तुतीकरण के दौरान उन्होंने कुछ ऐसे लोगों की तस्वीरें भी प्रदर्शित कीं, जिन्हें उन्होंने “एक्टिविस्ट” बताया। लेकिन वो असल के एक्टिविस्ट नहीं थे। बल्कि उन लोगों के ऊपर UAPA जैसे आरोप लग चुके हैं। उमर ख़ालिद जिसने एक प्रदर्शन को हिंदू विरोधी हिंसा में बदल दिया, उस उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को स्क्रॉल.इन की एग्जीक्यूटिव एडिटर ने उसे डिफेंड किया। जिन लोगों पर गंभीर आरोप हैं या जिनके मामले अदालतों में विचाराधीन रहे हैं, उन्हें सीधे तौर पर “एक्टिविस्ट” के रूप में पेश करना क्या निष्पक्ष पत्रकारिता का हिस्सा माना जा सकता है? आपको बता दें कि सुप्रिया शर्मा के ऊपर भी कई बार फेक न्यूज़ फैलाने के आरोप लग चुके हैं। उनके द्वारा लिखे गए कई लेख एक समुदाय विशेष के लिए रहा है।
2020 की रिपोर्ट को लेकर विवाद
वर्ष 2020 में कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान प्रकाशित एक रिपोर्ट को लेकर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई थी। विवाद उस समय पैदा हुआ जब वाराणसी की एक महिला ने दावा किया कि उनकी आर्थिक स्थिति और जीवन परिस्थितियों को रिपोर्ट में गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। इसके बाद मामला कानूनी विवाद में बदल गया और रिपोर्टिंग के तरीकों पर बहस शुरू हो गई।
हालांकि पत्रकार संगठनों और प्रेस स्वतंत्रता से जुड़े समूहों ने उस समय पत्रकारों के खिलाफ दर्ज मामलों पर चिंता भी जताई थी।
FCI रिपोर्टिंग पर भी उठा था सवाल
Scroll.in की रिपोर्टिंग को लेकर पहले भी कई विवाद सामने आए हैं। कोविड काल के दौरान खाद्य भंडारण और वितरण से संबंधित कुछ रिपोर्टों पर सरकारी एजेंसियों ने आपत्ति जताई थी। इसके बाद FCI के तरफ़ से स्क्रॉल को एक पत्र लिख गया और उसमें डेटा दिया गया। और फटकारते हुए कहा कि ये कहाँ से फैक्ट बेस्ड जर्नलिज्म है।
‘Love Jihad and Other Fictions’ पुस्तक भी चर्चा में
सुप्रिया शर्मा द्वारा सह-लेखित पुस्तक Love Jihad and Other Fictions भी लंबे समय से राजनीतिक और वैचारिक बहस का विषय रही है।
पुस्तक में “लव जिहाद” की अवधारणा और उससे जुड़े दावों का आलोचनात्मक विश्लेषण किया गया है। इस पुस्तक के द्वारा सुप्रिया और उनके दूसरे को-ऑथर ये बताना चाहते थे कि लव जिहाद जैसी चीज़ें भारत में होती ही नहीं है। ये सब कल्पना मात्र है।
मीडिया की निष्पक्षता पर फिर बहस
Oslo Freedom Forum में दिए गए भाषण के बाद एक बार फिर वही पुराना सवाल सामने आ गया है – क्या भारतीय मीडिया का एक वर्ग (वामपंथी वर्ग) निष्पक्ष पत्रकारिता कर रहा है, या फिर वैचारिक दृष्टिकोण उसकी रिपोर्टिंग को प्रभावित कर रहा है?
सुप्रिया शर्मा का Oslo Freedom Forum में दिया गया भाषण अब केवल एक भाषण नहीं रह गया है, बल्कि भारत में मीडिया की भूमिका, पत्रकारिता की निष्पक्षता और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की छवि को लेकर एक नई बहस का कारण बन गया है।
