राज्यसभा चुनाव 2026: क्या फिर लौटेगी ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’? 12 राज्यों के दंगल में कांग्रेस की बढ़ी टेंशन, NDA दो-तिहाई बहुमत के करीब

0
ChatGPT Image Jun 9, 2026, 12_53_17 PM

नई दिल्ली: देशभर के 12 राज्यों में होने वाले आगामी राज्यसभा चुनावों ने देश का सियासी पारा बढ़ा दिया है। उच्च सदन की इस जंग में कांग्रेस और राहुल गांधी की चिंताएं साफ तौर पर बढ़ती नजर आ रही हैं। हालत यह है कि विपक्षी खेमे में एक बार फिर ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ की एंट्री हो चुकी है और विधायकों को एकजुट रखने के लिए उन्हें होटलों में ठहराने की तैयारी की जा रही है।

सदन में पहले से ही कम संख्या बल से जूझ रही कांग्रेस को अब अपने विधायकों के टूटने का डर सता रहा है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाला एनडीए (NDA) उच्च सदन में ‘दो-तिहाई बहुमत’ के ऐतिहासिक आंकड़े की तरफ मजबूती से कदम बढ़ा रहा है। मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में बीजेपी समर्थित उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है।

बीजेपी की ‘तीसरी चाल’ और कांग्रेस की नाकेबंदी

मध्य प्रदेश में बीजेपी की एक रणनीतिक चाल ने कांग्रेस के भीतर भारी बेचैनी पैदा कर दी है। एक दिन पहले तक जो कांग्रेस अपने सभी विधायकों को पूरी तरह वफादार और एकजुट बता रही थी, चौबीस घंटे के भीतर ही उसका यह आत्मविश्वास डगमगाता दिख रहा है। पार्टी को अब अपने ही विधायकों की वफादारी पर पूरी तरह भरोसा नहीं रहा है।

विधायकों के फोन होंगे जब्त!

सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस ने आनन-फानन में अपने सभी विधायकों को मध्य प्रदेश से दूर, सीधे कर्नाटक शिफ्ट करने का फैसला किया है। सभी विधायकों को एक विशेष चार्टर्ड प्लेन से बेंगलुरु भेजा जा रहा है, जहां उन्हें एक सुरक्षित रिसॉर्ट में रखा जाएगा। चुनावी रणनीतिकारों के अनुसार:

  • चुनाव के दिन यानी 18 जून तक ये विधायक बाहरी दुनिया के संपर्क से दूर रहेंगे।
  • रिसॉर्ट में रहने के दौरान विधायकों के मोबाइल फोन भी जमा कराए जा सकते हैं ताकि विरोधी खेमा उनसे संपर्क न कर सके।

क्या है मध्य प्रदेश का गणित?

मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों के हिसाब से बीजेपी के दो प्रत्याशियों— तरुण चुघ और रजनीश अग्रवाल की जीत तय मानी जा रही है। इसके बाद भी बीजेपी के पास अतिरिक्त वोट बच रहे थे, जिस पर दांव खेलते हुए पार्टी ने तीसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारकर मुकाबला त्रिकोणीय कर दिया। हालांकि, कांग्रेस के पास अपनी एकमात्र उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन को जिताने के लिए पर्याप्त वोट हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों के कड़वे अनुभवों को देखते हुए पार्टी कोई जोखिम नहीं लेना चाहती।

नाथवानी की एंट्री से बिगड़े समीकरण

झारखंड में भी राज्यसभा चुनाव का गणित बेहद पेचीदा हो चुका है। यहां सत्तारूढ़ ‘इंडी (INDI) गठबंधन’ के पास कुल 56 विधायक हैं। नियमों के मुताबिक, दोनों सीटों पर जीत दर्ज करने के लिए उन्हें ठीक 56 वोटों की ही आवश्यकता है। यानी सत्ता पक्ष के पास एक भी वोट फालतू नहीं है और गणित बिल्कुल कांटे पर टिका है।

क्रॉस वोटिंग का खतरा: इसी बीच बीजेपी के समर्थन से निर्दलीय व्यवसायी परिमल नाथवानी ने मैदान में उतरकर विपक्षी खेमे की धड़कनें बढ़ा दी हैं। एनडीए के पास अपने खुद के 24 विधायक हैं। नाथवानी को जीत की दहलीज तक पहुंचाने के लिए एनडीए को विपक्ष के खेमे से कम से कम 4 और वोटों की जरूरत होगी। अगर सत्तापक्ष के किसी उम्मीदवार को 28 से कम वोट मिलते हैं, तो खेल ‘दूसरी वरीयता’ (Second Preference) के वोटों पर चला जाएगा, जहां बीजेपी बाजी मार सकती है।

एनडीए के पास ‘असीमित विधायी शक्ति’ का मौका

साल 2026 के ये राज्यसभा चुनाव भारतीय राजनीति के लिहाज से एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हो सकते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण 245 सदस्यीय उच्च सदन में एनडीए की ताकत का अभूतपूर्व रूप से बढ़ना है। एनडीए इस समय राज्यसभा में उस जादुई आंकड़े के बेहद करीब है, जो उसे संसद में असीमित विधायी शक्ति प्रदान करेगा— यानी दो-तिहाई बहुमत (164 सीटें)

  • संविधान संशोधन की ताकत: भारतीय संविधान में किसी भी बड़े और ऐतिहासिक बदलाव या संशोधन को पारित कराने के लिए उच्च सदन में दो-तिहाई बहुमत होना अनिवार्य है।
  • क्षेत्रीय समीकरणों का फायदा: गुजरात जैसे राज्यों में भारी बहुमत के कारण बीजेपी अपनी चारों सीटें निर्विरोध जीत रही है। इसके अलावा ओडिशा में सत्ता परिवर्तन और महाराष्ट्र में महायुति गठबंधन की मजबूत स्थिति से एनडीए की ताकत में भारी इजाफा हुआ है।

निष्कर्ष: क्या यही है लोकतंत्र की कड़वी सच्चाई?

अब देश की नजरें 18 जून को होने वाली वोटिंग और उसके नतीजों पर टिकी हैं। इसके बाद नवंबर में खाली होने वाली सीटों के परिणाम यह पूरी तरह साफ कर देंगे कि एनडीए 164 के इस ऐतिहासिक लक्ष्य को पार कर पाता है या इसके बेहद करीब जाकर रुकता है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर नैतिक राजनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या हर चुनाव से पहले ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ और विधायकों की बाड़ेबंदी ही आज के भारतीय लोकतंत्र की कड़वी सच्चाई बन चुकी है?

Leave a Reply

What’s next

Discover more from Detail News India

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading