‘मुल्क सब याद रखता है’… लेकिन क्या आपको नसीरुद्दीन शाह के पूर्वजों का इतिहास पता है?
बॉलीवुड अभिनेता नसीरुद्दीन शाह अक्सर अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। हाल ही में उन्होंने कहा कि मुल्क के सरकार से मैं कहना चाहता हूँ कि सब याद रखा जाएगा । उनके इस बयान के बाद सोशल Media पर एक अलग बहस छिड़ गई। कई लोगों ने उनके पूर्वजों का इतिहास सामने लाते हुए सवाल उठाया कि आखिर नसीरुद्दीन शाह के ग्रेट-ग्रेट ग्रैंडफादर कौन थे और 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका क्या थी?
कौन थे जान-फ़िशान ख़ान?
इतिहास के अनुसार, नसीरुद्दीन शाह के ग्रेट-ग्रेट ग्रैंडफादर सैयद मोहम्मद ख़ान, जिन्हें जान-फ़िशान ख़ान के नाम से जाना जाता है, अफ़ग़ान मूल के एक सरदार थे। बाद में उन्हें उत्तर प्रदेश के सरधना क्षेत्र में बसाया गया। ब्रिटिश शासन के दौरान उनका नाम उन लोगों में शामिल था, जिन्होंने अंग्रेज़ों के साथ मिलकर काम किया।
1857 की लड़ाई में किसका साथ दिया?
साल 1857 में जब भारत के अलग-अलग हिस्सों में अंग्रेज़ों के खिलाफ़ आज़ादी की पहली बड़ी लड़ाई लड़ी जा रही थी, तब जान-फ़िशान ख़ान ने क्रांतिकारियों का नहीं, बल्कि अंग्रेज़ों का साथ दिया। ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि उन्होंने अपने सैनिक और घुड़सवार ब्रिटिश सेना की मदद के लिए भेजे और दिल्ली तथा मेरठ के आसपास अंग्रेज़ी सेना के अभियानों में सहयोग किया। इसी वजह से इतिहास में उन्हें ब्रिटिश शासन का सहयोगी माना जाता है।
अंग्रेज़ों की पहले भी कर चुके थे मदद
यह पहली बार नहीं था जब जान-फ़िशान ख़ान ने अंग्रेज़ों का साथ दिया हो। इससे पहले प्रथम एंग्लो-अफ़ग़ान युद्ध के दौरान भी उन्होंने ब्रिटिश सेना की मदद की थी। अंग्रेज़ी अधिकारियों के साथ उनके अच्छे संबंध थे और यही कारण था कि ब्रिटिश सरकार उन पर भरोसा करती थी।
बदले में क्या मिला?
अंग्रेज़ों की मदद का इनाम भी उन्हें भरपूर मिला। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सरधना का नवाब बनाया, बड़ी-बड़ी जागीरें दीं और हर महीने पेंशन भी दी। कई ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में इसका उल्लेख मिलता है। इतिहासकारों का मानना है कि यह सम्मान उन्हें अंग्रेज़ों के प्रति वफ़ादारी के कारण मिला था।
सोशल मीडिया के दावों में कितनी सच्चाई?
सोशल मीडिया पर अक्सर यह दावा किया जाता है कि जान-फ़िशान ख़ान ने रानी लक्ष्मीबाई के खिलाफ़ लड़ाई लड़ी, अंग्रेज़ों के लिए जासूसी की और कई क्रांतिकारियों को पकड़वाया। लेकिन इन दावों के समर्थन में ऐसे ठोस और व्यापक रूप से स्वीकार किए गए ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, जिन्हें निर्विवाद तथ्य माना जा सके। इसलिए इन दावों को इतिहास का अंतिम सच नहीं कहा जा सकता।
क्यों हो रही है फिर चर्चा?
नसीरुद्दीन शाह के हालिया बयान के बाद उनके पूर्वजों का इतिहास एक बार फिर चर्चा में है। उपलब्ध ऐतिहासिक रिकॉर्ड यह बताते हैं कि जान-फ़िशान ख़ान ने अंग्रेज़ों का साथ दिया था और इसके बदले उन्हें ब्रिटिश सरकार से सम्मान, जागीर और पेंशन मिली। हालांकि, सोशल मीडिया पर वायरल हर दावे को बिना प्रमाण के इतिहास मान लेना उचित नहीं होगा। इतिहास का मूल्यांकन हमेशा दस्तावेज़ों और विश्वसनीय स्रोतों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
