पश्चिम बंगाल राजनीति: कानूनी शिकंजे और चुनावी झटकों के बीच टीएमसी की मुश्किलें बढ़ीं, हाईकोर्ट से अभिषेक बनर्जी को नहीं मिली राहत
पश्चिम बंगाल की राजनीति में नाटकीय मोड़ देखने को मिल रहा है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी पर केंद्रीय और राज्य स्तरीय जांच एजेंसियों का शिकंजा कसता जा रहा है। चुनाव नतीजों के बाद राज्य में राजनीतिक समीकरणों में आए बदलावों के बीच टीएमसी कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर चुनौतियों से घिरी नजर आ रही है।
कानूनी कार्रवाई और दर्ज हुई कई FIRs
हाल के घटनाक्रमों के बाद अभिषेक बनर्जी पर कई थानों में प्राथमिकी दर्ज की गई हैं। बिधाननगर साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन समेत राज्य के विभिन्न हिस्सों में चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए बयानों, कथित भड़काऊ भाषणों और असंसदीय टिप्पणियों को लेकर कुल 8 एफआईआर दर्ज हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ED) और सीआईडी (CID) की टीमें भी विभिन्न मामलों में दस्तावेजों की गहन जांच कर रही हैं।
विवादित बयान और नई FIR
हाल ही में मीडिया को दिए एक बयान में अभिषेक बनर्जी ने भविष्य में राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने का जिक्र करते हुए कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2031 में परिस्थितियां बदलने पर राजनीतिक विरोधियों से पाई-पाई का हिसाब लिया जाएगा। विपक्षी दलों ने इस बयान को सार्वजनिक मंच से दी गई धमकी और कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाला करार दिया है। इस बयान के बाद उनके खिलाफ एक और एफआईआर दर्ज की गई है।
कलकत्ता हाईकोर्ट से नहीं मिली राहत
कानूनी घेराबंदी के बीच अभिषेक बनर्जी ने कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनके वकीलों ने याचिका दायर कर दर्ज एफआईआर मामलों में किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से राहत और ‘ब्लैंकेट प्रोटेक्शन’ (गिरफ्तारी से सुरक्षा) की मांग की थी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस अर्जी पर सुनवाई करते हुए किसी भी प्रकार का ब्लैंकेट प्रोटेक्शन देने से साफ इनकार कर दिया। अदालत ने राहत याचिका खारिज करते हुए मामले की अगली सुनवाई 30 जुलाई, 2026 तय की है। कोर्ट के इस रुख के बाद बनर्जी के सामने कानूनी मुश्किलें बनी हुई हैं।
सांगठनिक स्तर पर हलचल
कानूनी मामलों के अलावा टीएमसी को सांगठनिक स्तर पर भी आंतरिक उथल-पुथल का सामना करना पड़ रहा है। राज्य में बदले राजनीतिक माहौल के कारण पार्टी के कुछ विधायकों और सांसदों के पाला बदलने की खबरें सामने आई हैं, जिससे ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के सामने अपनी पकड़ बनाए रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
