कोलकाता में NEET प्रदर्शन के नाम पर बवाल: उपद्रवियों का ‘माफिया टीम’ और TMC कनेक्शन, 14 गिरफ्तार, लेकिन एक भी छात्र नहीं!
NEET विवाद के नाम पर कोलकाता की सड़कों पर उपद्रव मचाने वाले आखिर कौन थे? कौन थे वे लोग जो लोकतंत्र का हवाला देकर खुलेआम पत्रकारों पर हमला कर रहे थे और सड़कों पर हिंसा भड़का रहे थे? कोलकाता पुलिस के ताज़ा खुलासे ने इस पूरे कथित ‘छात्र आंदोलन’ का सच जनता के सामने ला दिया है।
कोलकाता के धर्मतला में शुक्रवार को NEET परीक्षा पेपर लीक के विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई भीषण हिंसा और तोड़फोड़ के मामले में पुलिस ने सख़्त कार्रवाई की है। इस हिंसा के सिलसिले में पुलिस ने अब तक 14 उपद्रवियों को गिरफ्तार किया है—और पुलिस का सबसे बड़ा खुलासा यह है कि इनमें से एक भी व्यक्ति छात्र नहीं है।
ये सभी असामाजिक तत्व थे, जिन्होंने छात्र प्रदर्शन की आड़ में हिंसा भड़काई और खुलेआम सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया।
‘माफिया टीम’ और सत्ताधारी पार्टी से कनेक्शन
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब भागने की कोशिश कर रहे दो मुख्य आरोपियों—मोहम्मद आजाद और मोहम्मद अफ़रोज़—को दुर्गापुर एक्सप्रेसवे पर अंदाल के पास से धर दबोचा गया।
पुलिस जाँच के मुताबिक, आरोपी अफ़रोज़ के सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो मिले हैं जिनमें वह अपने गिरोह को खुल्लम-खुल्ला ‘माफिया टीम’ कहता है। इतना ही नहीं, अफ़रोज़ की तस्वीरें मेचियाबुरुज से तृणमूल कांग्रेस (TMC) विधायक अब्दुल खलेक मोल्ला के साथ भी सामने आई हैं।
हालांकि, विधायक अब्दुल खलेक मोल्ला ने इन आरोपों पर तुरंत सफाई देते हुए कहा कि वह एक जनप्रतिनिधि हैं और कोई भी उनके साथ तस्वीर खिंचवा सकता है, लेकिन अफ़रोज़ TMC का कोई सक्रिय सदस्य नहीं है। क्या कमाल का तर्क है! क्योंकि जब किसी अपराध में किसी हिंदू का नाम आता है, तो यही नेता तुरंत उसका कनेक्शन बीजेपी से ढूँढने में जुट जाते हैं।
30+ उम्र वाले उपद्रवी: कहाँ गया Gen-Z का नैरेटिव?
कोलकाता पुलिस ने इस हिंसा के संबंध में 7 अलग-अलग एफआईआर (FIR) दर्ज की हैं। आरोपियों पर गैर-कानूनी जमावड़ा करने, जानलेवा हथियारों का इस्तेमाल करने और शांति भंग करने जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई हैं।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि गिरफ्तार किए गए लोगों की उम्र 30 वर्ष से अधिक है। यानी ये लोग किसी भी लिहाज़ से Gen-Z या छात्र वर्ग से नहीं आते हैं, जिसे ढाल बनाकर यह पूरा ताना-बाना बुना गया था।
बिना अनुमति भीड़ और पुलिस-पत्रकारों पर हमला
पुलिस एफआईआर से यह भी साफ़ हुआ है कि वामपंथी छात्र और युवा संगठनों के नेतृत्व ने बिना किसी पुलिस अनुमति के धर्मतला में भीड़ जुटाई थी।
पुलिस द्वारा लाउडस्पीकर पर दी गई लगातार चेतावनियों को नजरअंदाज करते हुए उग्र भीड़ ने ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों, मीडिया कवरेज कर रहे पत्रकारों और आम राहगीरों पर पत्थर, बोतलें और डंडे फेंके, जिससे कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।
दोहरा मापदंड और ‘हिंसा का मॉडल’
फिलहाल, कोलकाता पुलिस गिरफ्तार सभी 14 आरोपियों को अदालत में पेश कर रही है और घटना में शामिल अन्य उपद्रवियों की तलाश जारी है।
लेकिन इस पूरी घटना से एक बात पूरी तरह साफ़ हो जाती है—बंगाल में चाहे पोस्ट-पोल वायलेंस (चुनाव बाद की हिंसा) हो या किसी राष्ट्रीय मुद्दे के नाम पर किया गया प्रदर्शन, हिंसा की अगली कतार में हमेशा सत्ताधारी दल और उनसे जुड़े नेटवर्क के लोग खड़े नज़र आते हैं।
विडंबना देखिए कि सड़कों पर खुद हिंसा और तोड़फोड़ यही करेंगे, और फिर टीवी स्टूडियो में बैठकर ‘लोकतंत्र और संविधान’ की बातें भी यही करेंगे!
