पश्चिम बंगाल में सरकारी बसों का बदला रंग, अब सड़कों पर दौड़ रही हैं भगवा बसें; राजनीतिक बहस तेज

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पश्चिम बंगाल की राजनीति में रंगों का हमेशा से खास महत्व रहा है। कभी लाल रंग वामपंथ की पहचान बना, तो तृणमूल कांग्रेस (TMC) के शासनकाल में सरकारी इमारतों से लेकर बसों तक पर नीले और सफेद रंग की छाप दिखाई देने लगी। अब राज्य में एक बार फिर सरकारी बसों के रंग बदलने को लेकर राजनीतिक चर्चा शुरू हो गई है।

दरअसल, पश्चिम बंगाल में नई सरकारी एसी बसों को भगवा (केसरिया) रंग में सड़कों पर उतारा गया है। इस बदलाव के बाद विपक्षी दलों और राजनीतिक हलकों में इसे लेकर बहस तेज हो गई है।

न्यू टाउन और दक्षिण 24 परगना में दिखीं नई भगवा बसें

हाल ही में न्यू टाउन में सोनारपुर से ईको स्पेस को जोड़ने वाले मार्ग पर एक नई सरकारी एसी बस दिखाई दी। इस बस की सबसे खास बात इसका रंग था। जहां अब तक सरकारी बसें नीले और सफेद रंग में नजर आती थीं, वहीं नई बस भगवा रंग में रंगी हुई थी।

इसी तरह दक्षिण 24 परगना के घटकपुर से हावड़ा के संतरागाछी रूट पर भी कई नई भगवा रंग की सरकारी बसों का संचालन शुरू किया गया है।

नई बसों को देखकर कई यात्रियों ने भी हैरानी जताई, क्योंकि लंबे समय से वे सरकारी बसों को नीले-सफेद रंग में देखने के आदी थे।

परिवहन मंत्री ने बताया बदलाव का कारण

राज्य के परिवहन मंत्री अर्जुन सिंह ने इस बदलाव को लेकर कहा कि कोलकाता और पश्चिम बंगाल का सार्वजनिक परिवहन समय के साथ आधुनिक होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि केसरिया रंग केवल एक रंग नहीं है, बल्कि तेज़ी से काम करने वाली ‘डबल इंजन’ सरकार, आधुनिकीकरण और पर्यावरण के अनुकूल परिवहन व्यवस्था का प्रतीक भी है।

विपक्ष ने उठाए सवाल

सरकारी बसों के रंग बदलने को लेकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) और वामपंथी समर्थकों की ओर से सवाल भी उठाए जा रहे हैं। उनका कहना है कि बसों के रंग बदलने की क्या आवश्यकता थी और क्या इससे परिवहन व्यवस्था में कोई वास्तविक बदलाव आएगा।

इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर भी बहस देखने को मिल रही है, जहां कुछ लोग इसे सामान्य प्रशासनिक फैसला बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे राजनीतिक प्रतीकवाद से जोड़कर देख रहे हैं।

पहले भी बदलते रहे हैं सरकारी रंग

पश्चिम बंगाल में सरकारी संपत्तियों के रंग बदलने का यह पहला मामला नहीं है।

वामपंथी शासन के दौरान सरकारी बसों और कई सार्वजनिक परिसंपत्तियों पर लाल रंग का प्रभाव दिखाई देता था। बाद में तृणमूल कांग्रेस की सरकार आने के बाद सरकारी इमारतों, बसों और कई सार्वजनिक स्थलों को नीले और सफेद रंग में रंगा गया।

अब नई सरकार के कार्यकाल में भगवा रंग की बसों के सड़कों पर उतरने से एक बार फिर रंगों की राजनीति चर्चा का विषय बन गई है।

रंगों की राजनीति या प्रशासनिक बदलाव?

बसों के नए रंग को लेकर राजनीतिक दलों के अपने-अपने तर्क हैं। समर्थकों का कहना है कि सरकार को सार्वजनिक परिवहन के आधुनिकीकरण और नई पहचान देने का अधिकार है, जबकि आलोचकों का मानना है कि रंग बदलने की बजाय परिवहन सेवाओं की गुणवत्ता पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।

फिलहाल पश्चिम बंगाल की सड़कों पर भगवा रंग की नई सरकारी बसें लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं और इनके साथ राजनीतिक बहस भी लगातार जारी है।

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