सरला भट्ट हत्याकांड: 36 साल बाद खुलेगा इंसाफ का रास्ता, SIA की चार्जशीट ने बेनकाब किया यासीन मलिक का ‘गांधीवादी’ मुखौटा
मुख्य बातें:
- 14 अप्रैल 1990 को JKLF के आतंकियों ने हॉस्टल से किया था 27 वर्षीय नर्स सरला भट्ट का अपहरण।
- 5 दिनों तक बंधक बनाकर बर्बरता और सामूहिक बलात्कार के बाद सीने में उतार दी थीं गोलियां।
- जून 2026 में स्टेट इंवेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) ने अदालत में दाखिल की 737 पन्नों की चार्जशीट।
- तिहाड़ जेल में बंद यासीन मलिक पर अब हत्या, अपहरण और गैंगरेप की साजिश का चलेगा मुकदमा।
19 अप्रैल, 1990 की वो सुबह कश्मीर के इतिहास की सबसे खौफनाक सुबहों में से एक थी। श्रीनगर की उमर कॉलोनी के मालबाग इलाके में सुबह की धुंध अभी छंटी भी नहीं थी कि सड़क के किनारे पड़ी एक बोरी ने राहगीरों का ध्यान खींचा। जब उस बोरी को खोला गया, तो देखने वालों की रूह कांप गई। वो 27 साल की एक लड़की की लाश थी, जिसके बदन का कोई हिस्सा ऐसा नहीं था जहां दरिंदगी के निशान न हों। उसे सिगरेट से दागा गया था, अंगों को क्षत-विक्षत किया गया था, और सीने में गोलियां उतारी गई थीं।
इस खौफनाक लाश के ठीक बगल में एक कागज का टुकड़ा पड़ा था, जिस पर हाथ से लिखा था JKLF (जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट)। मृतक लड़की पेशे से एक स्टाफ नर्स थी, जिसका गुनाह सिर्फ इतना था कि वो एक कश्मीरी हिंदू थी और बंदूक के साए में भी अपने फर्ज पर अडिग थी। यह कहानी है सरला भट्ट की, जिनके साथ कट्टरपंथियों ने मानवता को शर्मसार करने वाली बर्बरता की थी।
फर्ज के आगे खौफ को दी मात
साल 1989 के आखिरी हफ्ते और 1990 की शुरुआत में कश्मीर घाटी की हवाएं पूरी तरह बदल चुकी थीं। सूफी संगीत की जगह सड़कों पर कश्मीरी पंडितों के खिलाफ हिंसक और डरावने नारे गूंज रहे थे। तत्कालीन गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण के बाद सरकार के घुटने टेकने से आतंकियों के हौसले बुलंद थे। टीका लाल टपलू और जस्टिस नीलकंठ गंजू जैसी हस्तियों की दिन-दहाड़े हत्या की जा रही थी।
19 जनवरी 1990 को जब कश्मीरी पंडितों का सबसे बड़ा पलायन हुआ, तब भी अनंतनाग के काजीबाग की रहने वाली 27 वर्षीय सरला भट्ट ने भागने के बजाय श्रीनगर के SKIMS (शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज) अस्पताल में बतौर स्टाफ नर्स अपनी सेवाएं जारी रखने का फैसला किया। वह अस्पताल के हब्बा खातून हॉस्टल के कमरा नंबर 30 में रहती थीं।
14 अप्रैल 1990: वो मनहूस रात
उस दौर में घाटी के अस्पतालों में आतंकी संगठनों के स्लीपर सेल्स सक्रिय थे। 14 अप्रैल 1990 की रात, जब श्रीनगर में सन्नाटा पसरा था, AK-47 से लैस JKLF के चार खूंखार आतंकी हब्बा खातून हॉस्टल में दाखिल हुए। वे सीधे सरला भट्ट के कमरे में पहुंचे और बंदूक की नोक पर, मुंह दबाकर उन्हें घसीटते हुए ले गए। डर के मारे हॉस्टल का बाकी स्टाफ अपने कमरों में दुबक गया। सरला भट्ट को एक गुप्त ठिकाने पर ले जाकर भारतीय सेना की जासूस होने का कबूलनामा मांगा गया। इनकार करने पर उन्हें भूखा रखा गया, जलती सिगरेटों से दागा गया और उनके साथ सामूहिक बलात्कार (Gangrape) किया गया। 5 दिनों के असहनीय टॉर्चर के बाद 19 अप्रैल को आतंकियों ने उनके सीने में गोलियां मारकर शव को सड़क किनारे फेंक दिया और ऊपर एक पर्ची छोड़ दी, जिस पर लिखा था—“यह भारतीय जासूसों का अंजाम है।”
जब इंसाफ की फाइलें अलमारियों में दफन हो गईं
वारदात के बाद श्रीनगर के निगिन पुलिस स्टेशन में FIR तो दर्ज हुई, लेकिन घाटी के बिगड़े हालातों और गवाहों के डर के कारण जांच ठप हो गई। सरला भट्ट का परिवार अपनी जान बचाकर रातों-रात जम्मू भागने पर मजबूर हो गया और वे अपनी बेटी का ठीक से अंतिम संस्कार तक नहीं कर पाए। इसके बाद के सालों में देश की राजनीति में एक हैरान करने वाला दौर देखा गया। जिस JKLF ने इस बर्बरता को अंजाम दिया, उसका सरगना यासीन मलिक दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में बड़े-बड़े नेताओं से हाथ मिलाता नजर आया। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ उसकी तस्वीरें सामने आईं और उसे ‘शांति का दूत’ बनाकर पेश किया गया, जबकि सरला भट्ट की फाइलें सचिवालय की अलमारियों में धूल खाती रहीं।
आर्टिकल 370 के बाद बदला दौर, SIA ने झाड़ी फाइलों की धूल
साल 2019 में जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटने के बाद घाटी का पूरा प्रशासनिक ढांचा बदल गया। आतंकी फंडिंग और पुराने नरसंहारों की जांच के लिए SIA (स्टेट इंवेस्टिगेशन एजेंसी) का गठन किया गया। अगस्त 2025 में, प्रशासन के कड़े निर्देशों के बाद SIA ने कश्मीरी पंडितों की हत्याओं की बंद फाइलों को दोबारा खोलने का ऐतिहासिक फैसला लिया। 36 साल पुराने मामले में सबूत जुटाना एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि कई गवाह या तो दम तोड़ चुके थे या घाटी छोड़ चुके थे। लेकिन SIA के अधिकारियों ने डिजिटल फॉरेंसिक, पुराने मेडिकल रिकॉर्ड्स और 1990 में SKIMS में तैनात रहे रिटायर्ड डॉक्टरों व नर्सों को ढूंढकर उनके गोपनीय बयान दर्ज किए।
737 पन्नों की चार्जशीट और यासीन मलिक का पर्दाफाश
जून 2026 में SIA ने अदालत में 737 पन्नों की एक विस्तृत चार्जशीट दाखिल की है। इस चार्जशीट ने यासीन मलिक के तथाकथित ‘गांधीवादी’ मुखौटे को पूरी तरह से उतार दिया है। चार्जशीट के अनुसार:
- सरला भट्ट का अपहरण और मर्डर JKLF की सोची-समझी साजिश थी, जिसका मकसद कश्मीरी पंडितों में खौफ पैदा करना था।
- मुख्य आरोपियों में यासीन मलिक का नाम शामिल है, जो फिलहाल दिल्ली की तिहाड़ जेल में टेरर फंडिंग के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है। अब उस पर इस मामले में हत्या, अपहरण और गैंगरेप की साजिश का अलग से मुकदमा चलेगा।
- मामले के अन्य तीन आरोपी अब्दुल हामिद शेख, मोहम्मद यूसुफ सूफी उर्फ इदरीस, और गुलाम मोहम्मद टपलू की मौत हो चुकी है।
36 वर्षों तक न्याय के लिए तरस रहे सरला भट्ट के परिवार को आज इस चार्जशीट से थोड़ी राहत जरूर मिली होगी। यह मामला इस बात का गवाह है कि वक्त भले ही लंबा लग जाए, लेकिन सच और न्याय को दबाया नहीं जा सकता।
