EVM राग पर विपक्ष का ‘यू-टर्न’, बहानों की फैक्ट्री पर सुप्रीम कोर्ट के नियम का ताला; अब UP में राहुल-अखिलेश की परीक्षा
Opposition u-turn on EVM: जो विपक्ष कल तक चुनाव हारते ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का रोना रोता था, इस बार उसे क्लीन चिट मिल गई है। पांच राज्यों के हालिया विधानसभा चुनावों के बाद आई एक रिपोर्ट ने राजनीतिक विश्लेषकों से लेकर आम जनता तक सबको चौंका दिया है। इसी के साथ विपक्ष के दावों और उनके ‘EVM हैकिंग’ के कथित झूठ की पोल भी पूरी तरह खुल गई है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज है कि बहानों का यह पाखंड ही विपक्ष की लगातार हार की सबसे बड़ी वजह बन चुका है, और अब आगामी उत्तर प्रदेश (UP) विधानसभा चुनाव राहुल गांधी और अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ी परीक्षा साबित होने वाले हैं।
चुनाव नतीजों के बाद अचानक ‘EVM राग’ पर सन्नाटा क्यों?
हाल ही में देश के 5 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव संपन्न हुए। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत नतीजे भी सामने आए—कहीं किसी की सरकार बनी, तो कहीं किसी को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। लेकिन इस बार के नतीजों के बाद भारतीय राजनीति में एक अजीब सा सन्नाटा देखने को मिला।
हमेशा चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करने वाले किसी भी विपक्षी नेता ने इस बार EVM पर एक भी सवाल नहीं उठाया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष अपनी रणनीतिक विफलताओं को छुपाने के लिए तुरंत गिरगिट की तरह रंग बदल लेता है, लेकिन इस बार उनके सामने कानूनी और तकनीकी तौर पर कोई रास्ता नहीं बचा था।
महाराष्ट्र चुनाव 2024 का वह ‘हाई-वोल्टेज ड्रामा’
जरा याद कीजिए कुछ समय पहले का वह दौर, जब भी चुनावी नतीजे विपक्ष के अनुकूल नहीं आते थे, तो उसका सीधा ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ दिया जाता था। अपनी संगठनात्मक कमजोरियों को छुपाने के लिए भारत के लोकतंत्र की साख को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूमिल करने की पूरी कोशिश की गई; विदेशी मंचों पर जाकर देश के चुनावी सिस्टम पर सवाल उठाए गए।
- रिकॉर्ड आवेदन: नवंबर 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में जब महाविकास अघाड़ी (MVA) को करारी शिकस्त मिली, तो बौखलाहट में रिकॉर्ड 104 एप्लीकेशंस डाली गईं।
- मशीनों की जांच: करीब 755 EVMs की जांच की मांग की गई और लगभग 50 कोर्ट केस ठोक दिए गए।
- नतीजा: हर बार की तरह सघन जांच के बाद भी EVM में कोई खराबी या गड़बड़ी नहीं पकड़ी गई।
राहुल गांधी का नया नैरेटिव
जब EVM हैकिंग वाला पुराना और घिसा-पिटा झूठ कानूनी कसौटी पर टिक नहीं पाया, तो विपक्ष ने तुरंत अपनी रणनीति बदल ली। अब विपक्षी नेता सीधे तौर पर EVM की बात करने से बच रहे हैं, क्योंकि वहां उनकी भारी किरकिरी हो चुकी है। अब इसकी जगह कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों ने एक नया नैरेटिव गढ़ लिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी अब खुलकर कह रहे हैं कि देश में ‘वोट चोरी’ हो रही है।
विपक्ष के नेता अब सीधे चुनाव आयोग की SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं, जो मूल रूप से वोटर लिस्ट की री-चेकिंग, सुधार और अपडेशन की एक पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रिया है।
विपक्ष का यही दोहरा मापदंड आज आम मतदाताओं के बीच उनकी क्रेडिबिलिटी को पूरी तरह खत्म कर चुका है। आज का जागरूक वोटर यह समझ चुका है कि इन नेताओं के पास न तो कोई ठोस विजन है और न ही जनादेश को स्वीकार करने का जिगरा।
जमीनी कार्यकर्ताओं में निराशा और मानसिक कंगाली
राहुल गांधी समेत पूरा INDI गठबंधन इस कदर भ्रमित और हताश है कि उन्हें खुद नहीं पता कि जमीन पर जनता के असल मुद्दों पर लड़ाई कैसे लड़ी जाए। कभी वे EVM को दोष देते हैं, कभी वोटर लिस्ट को कोसते हैं, तो कभी देश की जनता की समझदारी पर ही सवाल उठाने लगते हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक नेतृत्व अपनी हर नाकामी का ठीकरा एक निर्जीव मशीन पर फोड़ता रहेगा, तब तक उनके अपने जमीनी कार्यकर्ता भी निराश होते रहेंगे। बूथ स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को भी लगने लगता है कि जब ‘मशीन ही हैक होनी है, तो जमीन पर पसीना बहाने का क्या फायदा?’ यही वह वैचारिक और मानसिक कंगाली है, जिसने विपक्ष को लगातार हार के रसातल में धकेल दिया है।
पांच राज्यों में EVM चेकिंग से पैर पीछे खींचना और नए बहानों की तरफ भागना साफ दिखाता है कि विपक्ष अंदर से चुनाव से पहले ही मानसिक रूप से हार स्वीकार कर चुका है। अब देखना यह होगा कि उत्तर प्रदेश की आगामी राजनीतिक जंग में राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जोड़ी इस जमीनी हकीकत का सामना कैसे करती है।
