शिवसेना (UBT) में फिर बड़ी बगावत की सुगबुगाहट? दिल्ली पहुंचे संजय राउत, दांव पर उद्धव ठाकरे का सियासी वजूद
मुंबई/दिल्ली: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़े सियासी भूचाल के संकेत मिल रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बाद अब उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना (UBT) पर अस्तित्व का संकट मंडराता दिख रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं कि उद्धव गुट के कुछ सांसद बगावत का झंडा बुलंद कर दिल्ली दरबार में दस्तक दे चुके हैं। इस बीच, डैमेज कंट्रोल के लिए पार्टी के संकटमोचक संजय राउत आनन-फानन में दिल्ली रवाना हुए हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या अब बहुत देर हो चुकी है?
बंद दरवाजा और सांसदों की नाराजगी: क्या 2022 का इतिहास खुद को दोहरा रहा है?
मामला सीधा है, लेकिन इसके पीछे की सियासत बेहद पेचीदा है। सूत्रों के मुताबिक, उद्धव गुट के कुछ सांसद पार्टी नेतृत्व के कामकाज के तरीके से बेहद नाराज हैं और वे सीधे लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात करने की तैयारी में हैं।
नाराजगी की वजह वही पुरानी बताई जा रही है जो साल 2022 में एकनाथ शिंदे की बगावत के वक्त सामने आई थी— “नेतृत्व तक पहुंच की कमी।”
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि सांसदों को उद्धव ठाकरे से मिलने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। ‘मातोश्री’ का यही बंद दरवाजा एक बार फिर शिवसेना (UBT) के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बनता नजर आ रहा है।
समझिए बगावत का पूरा गणित (The Numbers Game)
दलबदल कानून के तहत बिना किसी कानूनी कार्रवाई (अयोग्यता) के पार्टी से अलग होने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। शिवसेना (UBT) के मौजूदा आंकड़ों पर नजर डालें तो गणित कुछ इस प्रकार है:
| विवरण | संख्या |
| शिवसेना (UBT) के कुल लोकसभा सांसद | 9 |
| दलबदल कानून से बचने के लिए जरूरी (2/3 बहुमत) | 6 |
अगर असंतुष्ट गुट 6 सांसदों का आंकड़ा जुटाने में कामयाब हो जाता है, तो उद्धव ठाकरे के हाथ से पार्टी का यह गुट भी निकल जाएगा। यह भारतीय राजनीति में संभवतः पहली बार होगा जब एक ही क्षेत्रीय पार्टी दो बार बड़े विभाजन का शिकार होगी।
शिंदे गुट के संपर्क में सांसद, संजय राउत के दावों में कितना दम?
एक तरफ जहां संजय राउत मीडिया के सामने आकर ऑल इज वेल (सब ठीक है) का दावा कर रहे हैं और कह रहे हैं कि “पार्टी एकजुट है”, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत कुछ और ही इशारा कर रही है। चर्चा है कि उद्धव गुट के कई सांसद इस समय मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के खेमे के वरिष्ठ नेताओं के सीधे संपर्क में हैं।
2022 में जब एकनाथ शिंदे ने बगावत की थी, तब उद्धव खेमे ने उन्हें ‘गद्दार’ कहकर पल्ला झाड़ लिया था और दावा किया था कि अब पार्टी ‘शुद्ध’ हो गई है। लेकिन अगर आज फिर वही कहानी दोहराई जाती है, तो नेतृत्व को अपने आत्मनिरीक्षण की जरूरत होगी।
निष्कर्ष: क्या बिखर रही है बाल ठाकरे की विरासत?
सत्ता हाथ से जा चुकी है, संगठन का एक बड़ा हिस्सा पहले ही अलग हो चुका है, और अब अगर निर्वाचित सांसद भी साथ छोड़ देते हैं, तो उद्धव ठाकरे के पास सिर्फ एक ‘विरासत’ रह जाएगी जो लगातार बिखरती जा रही है। संजय राउत के दिल्ली दौरे से साफ है कि मातोश्री में खलबली मची है और उद्धव ठाकरे का ‘रिमोट कंट्रोल’ अब बेअसर साबित हो रहा है।
महाराष्ट्र की सियासत में पल-पल बदलते घटनाक्रम इस बात का संकेत हैं कि आगामी दिन उद्धव ठाकरे के राजनीतिक करियर के लिए सबसे बड़ी परीक्षा साबित होने वाले हैं।
