शिव भक्त गुलशन कुमार को क्यों मरवाया गया था? जानिए उनकी हत्या की पूरी कहानी
हाथ में पूजा की थाली थी, होंठों पर भगवान का नाम था। लेकिन अगले ही पल गोलियों की आवाज़ ने सब कुछ बदल दिया। मंदिर से बाहर निकलते ही उन पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दी गईं और देखते ही देखते भारतीय संगीत जगत का एक बड़ा नाम हमेशा के लिए खामोश हो गया। सवाल यह है कि आखिर गुलशन कुमार किसकी आंखों में खटकने लगे थे? उनकी हत्या क्यों करवाई गई थी?
जूस बेचने वाले लड़के से म्यूजिक किंग बनने तक का सफर
आज भारत में भक्ति संगीत का नाम लिया जाता है तो सबसे पहले गुलशन कुमार का नाम याद आता है। दिल्ली की गलियों में जूस बेचने वाले एक साधारण युवक से लेकर टी-सीरीज़ जैसे विशाल म्यूजिक साम्राज्य के संस्थापक बनने तक का सफर उन्होंने अपनी मेहनत और दूरदर्शिता के दम पर तय किया था।
गुलशन कुमार सिर्फ एक सफल कारोबारी ही नहीं थे, बल्कि भगवान शिव के परम भक्त भी माने जाते थे। वे नियमित रूप से मंदिरों में पूजा-पाठ करते थे और धार्मिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। उनकी यही पहचान उन्हें लाखों लोगों के बीच लोकप्रिय बनाती थी।
कहानी में आता है नदीम सैफी का नाम
इस पूरे मामले को समझने के लिए एक नाम याद रखना जरूरी है—नदीम सैफी।
साल 1997 में नदीम सैफी ने “हाय अजनबी” नाम का एक एल्बम लॉन्च किया था। उनकी इच्छा थी कि टी-सीरीज़ इस एल्बम के अधिकार खरीदे और उसका बड़े स्तर पर प्रचार करे। बाद में टी-सीरीज़ ने एल्बम के अधिकार खरीद भी लिए और उसके प्रचार के लिए म्यूजिक वीडियो भी तैयार कराया।
हालांकि, रिलीज के बाद एल्बम को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। गुलशन कुमार के भाई किशन कुमार ने अदालत में दिए गए अपने बयान में दावा किया था कि एल्बम के फ्लॉप होने के बाद नदीम काफी नाराज थे। उनका मानना था कि टी-सीरीज़ ने एल्बम का पर्याप्त प्रचार नहीं किया। किशन कुमार के अनुसार, एक मुलाकात के दौरान नदीम ने गुलशन कुमार को धमकी भी दी थी।
अबू सलेम की धमकी भरी कॉल
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। 5 अगस्त 1997 को अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम ने गुलशन कुमार को फोन किया। रिपोर्टों के अनुसार, सलेम ने फोन पर कहा, “वैष्णो देवी में रोज़ लंगर खिलाते हो, कुछ हमें भी खिलाओ।”
इसके बाद उसने कथित तौर पर 10 करोड़ रुपये की मांग की और यह भी पूछा कि नदीम के एल्बम का ठीक से प्रचार क्यों नहीं किया गया। बताया जाता है कि गुलशन कुमार ने जवाब दिया कि एल्बम इसलिए नहीं चला क्योंकि लोगों को वह पसंद नहीं आया।
9 अगस्त 1997 को एक बार फिर अबू सलेम का फोन आया। इस बार भी पैसे की मांग दोहराई गई। कथित तौर पर सलेम ने कहा, “तुम अंडरवर्ल्ड को हल्के में ले रहे हो। आगे जो होगा, उसकी जिम्मेदारी तुम्हारी होगी।”
पुलिस के पास क्यों नहीं गए गुलशन कुमार?
धमकियों के बाद कई लोगों ने गुलशन कुमार को पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। माना जाता है कि उन्हें विश्वास नहीं था कि पुलिस उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर पाएगी।
उस समय फिल्म निर्देशक राजीव राय पर भी हमला हुआ था, लेकिन उन्हें पुलिस सुरक्षा मिली हुई थी, जिसके कारण उनकी जान बच गई। इसके बावजूद गुलशन कुमार ने पुलिस को औपचारिक शिकायत नहीं दी।
मंदिर बना उनकी दिनचर्या का हिस्सा
मुंबई के लोखंडवाला इलाके में स्थित एक शिव मंदिर गुलशन कुमार की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुका था। बताया जाता है कि उन्होंने मंदिर के जीर्णोद्धार में भी योगदान दिया था और वहां नियमित रूप से पूजा करने जाते थे।
यही नियमित दिनचर्या बाद में हमलावरों के लिए उनकी गतिविधियों पर नजर रखने का जरिया बन गई।
12 अगस्त 1997: वह दिन जिसने सब कुछ बदल दिया
12 अगस्त 1997 की सुबह गुलशन कुमार हमेशा की तरह पूजा करने के लिए मंदिर पहुंचे। उन्होंने सफेद कुर्ता-पजामा पहन रखा था और हाथ में पूजा की थाली थी। पूजा समाप्त करने के बाद जैसे ही वे अपनी कार की ओर लौटे, उन पर हमला कर दिया गया।
रिपोर्टों के अनुसार, पहली गोली उनके सिर के पास से गुजरी। इसके बाद हमलावरों ने उन पर लगातार गोलियां चलाईं। गंभीर रूप से घायल गुलशन कुमार ने आसपास मौजूद लोगों से मदद मांगने की कोशिश की, लेकिन उन्हें तत्काल सहायता नहीं मिल सकी। हमलावरों ने उन पर कई राउंड फायरिंग की। बाद में अस्पताल ले जाने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।
जांच में क्या सामने आया?
हत्या के बाद मुंबई पुलिस और जांच एजेंसियों ने मामले की जांच शुरू की। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जांच के दौरान अंडरवर्ल्ड कनेक्शन सामने आया।इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन ने दावा किया था कि इस हत्या के पीछे अबू सलेम का हाथ था।
अदालत का फैसला
कई मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस मामले में अंतिम महत्वपूर्ण फैसला वर्ष 2021 में आया। अदालत ने अब्दुल रऊफ उर्फ दाऊद मर्चेंट और अब्दुल राशिद को हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि हत्या एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा थी। हालांकि, कानूनी और तकनीकी कारणों के चलते अबू सलेम पर इस मामले में अलग परिस्थितियों में कार्रवाई हुई और मुकदमे की प्रक्रिया जटिल बनी रही।
