अधिकार की दुहाई, कर्तव्य से दूरी? जनसंख्या नियंत्रण और असदुद्दीन ओवैसी के बयान पर छिड़ी नई बहस
Owaisi on SIR: लोकतंत्र में अधिकार सबको चाहिए, लेकिन जब बात नागरिक कर्तव्यों की आती है, तो अक्सर सन्नाटा पसर जाता है। हमारे देश में एक ऐसी मानसिकता तेजी से पैर पसार रही है, जहां देश और समाज के प्रति योगदान भले ही न के बराबर हो, लेकिन अधिकारों की कतार में सबसे आगे खड़े होने की होड़ मची रहती है। मौजूदा समय में भारत जिस सबसे बड़े संकट से जूझ रहा है, वह है बेकाबू होती आबादी। बढ़ता जन्मदर (Birth Rate) आज हमारे सिस्टम और सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। लेकिन इस गंभीर विषय के बीच राजनीतिक बयानबाजियां इसे एक अलग ही दिशा में ले जा रही हैं।
ओवैसी का अजीबोगरीब बयान
दरअसल, यह पूरा विवाद चुनाव आयोग द्वारा देश भर में चलाई जा रही वोटर लिस्ट अपडेशन प्रक्रिया के दौरान शुरू हुआ। इसी कवायद को लेकर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (AIMIM) के चीफ और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी का एक अजीबोगरीब बयान सामने आया है।
सोशल मीडिया पर सामने आए अपने बयान में ओवैसी ने कहा कि भारत के संविधान में ऐसा कोई कानून नहीं है, जो किसी नागरिक को ज्यादा बच्चे होने की वजह से वोट डालने के अधिकार से वंचित करता हो। उन्होंने दावा किया कि वोटर लिस्ट मैपिंग के दौरान 5 से ज्यादा बच्चों को मैप नहीं किया जा रहा है। ओवैसी ने इस बात पर जोर दिया कि मतदान एक संवैधानिक अधिकार है, जो देश के हर पात्र नागरिक को बिना किसी शर्त के प्राप्त है।
संविधान की दुहाई
दिन-रात संविधान की रक्षा की दुहाई देने वाले बैरिस्टर असदुद्दीन ओवैसी संविधान में दिए गए अधिकारों की बात तो प्रमुखता से करते हैं, लेकिन उसी संविधान में दर्ज नागरिकों के मूल कर्तव्यों को पूरी तरह नजरअंदाज कर जाते हैं।
विचारणीय प्रश्न: देश के पास संसाधन सीमित हैं और नौकरियां भी सीमित हैं। ऐसे में क्या यह सोचना हर नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी नहीं है कि वह अपनी आने वाली पीढ़ी और देश को क्या दे रहा है?
जब देश का एक बड़ा वर्ग लगातार इस बात की कोशिश कर रहा है कि आबादी को नियंत्रित किया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक बेहतर और सुरक्षित भविष्य मिल सके, वहीं दूसरी तरफ एक खास वर्ग जनसंख्या बढ़ाने की रफ्तार पर ब्रेक लगाने को तैयार नहीं दिखता।
‘डेमोग्राफिक इमबैलेंस’ का खतरा और वोट बैंक की राजनीति
भारत को किसी भी तरह के डेमोग्राफिक इमबैलेंस (Demographic Imbalance) यानी जनसांख्यिकीय असंतुलन से बचाने के लिए अब सख्त कदम उठाने की मांग तेज हो रही है। दुनिया के कई विकसित और विकासशील देश अपनी जनसंख्या को संतुलित करने के लिए कड़े कानून बना रहे हैं। इसके विपरीत, हमारे देश में जब भी ‘जनसंख्या नियंत्रण कानून’ की बात होती है, तो उसे तुरंत धर्म और राजनीति के चश्मे से देखा जाने लगता है।
यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या बच्चों को केवल एक राजनीतिक दल या मोहरे के रूप में, यानी ‘वोट बैंक’ की संख्या बढ़ाने का जरिया समझा जा रहा है? अगर राजनीतिक सोच सिर्फ इतनी है कि जितने ज्यादा बच्चे होंगे, उतना बड़ा वोट बैंक तैयार होगा, तो यह सोच इस देश के भविष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
कानून की जरूरत और नागरिक जिम्मेदारी
राजनीतिक बयानबाजियों और पैंतरेबाज़ी से अलग हटकर, आज हर देशवासी को यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या वह देश के विकास में भागीदार बन रहा है या फिर सीमित संसाधनों पर बोझ बढ़ा रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि केंद्र सरकार ने अभी तक कम बच्चे पैदा करने या जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कोई प्रत्यक्ष कठोर कानून नहीं बनाया है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए देश के बुद्धिजीवी वर्ग का मानना है कि इस वक्त एक सख्त जनसंख्या नियंत्रण कानून की बेहद जरूरत है।
