तमिलनाडु में मीडिया पर ‘सेंसरशिप’ का आरोप: विजय सरकार के फैसले पर भड़का विपक्ष, 3 तमिल न्यूज़ चैनलों का प्रसारण बंद

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चेन्नई: देश में ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर अक्सर बड़ी बहस छिड़ती है। आमतौर पर यह चर्चा केंद्र सरकार के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाती है, लेकिन ताजा घटनाक्रम ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या राज्यों की क्षेत्रीय सरकारें भी आलोचना बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं? तमिलनाडु में अभिनेता से राजनेता बने जोसेफ विजय की सरकार (TVK) के एक हालिया फैसले ने लोकतंत्र और मीडिया की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

अरासु केबल नेटवर्क पर लगा सेंसरशिप का आरोप

तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन के बाद बड़े-बड़े दावे और वादे किए गए थे। लेकिन आरोप है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते ही जोसेफ विजय की सरकार ने मीडिया की आवाज को दबाने और उस पर अंकुश लगाने का खेल शुरू कर दिया है।

ताजा विवाद राज्य के सरकारी केबल नेटवर्क ‘अरासु केबल टीवी कॉर्पोरेशन’ को लेकर है। आरोप है कि जनता तक सूचनाएं पहुँचाने वाले इस नेटवर्क का इस्तेमाल अब सेंसरशिप के हथियार के रूप में किया जा रहा है। अरासु केबल पर राज्य के तीन बड़े तमिल न्यूज़ चैनलों पॉलिमिर टीवी (Polimer TV), जनम तमिल (Janam Tamil) और न्यूज़ तमिल 24×7 (News Tamil 24×7) का प्रसारण अचानक और पूरी तरह से ठप कर दिया गया है। इस एकतरफा कार्रवाई से पत्रकारिता जगत हैरान है।

क्या है चैनलों को बंद करने की वजह?

राजनीतिक विश्लेषकों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन तीनों चैनलों का ‘कसूर’ सिर्फ इतना था कि वे राज्य की बदहाल कानून-व्यवस्था और बिजली कटौती जैसी जमीनी समस्याओं पर लगातार तीखे सवाल उठा रहे थे। नई सरकार के सत्ता संभालने के बाद से ही ये चैनल जनता की तकलीफों को प्रमुखता से दिखा रहे थे। लेकिन ऐसा लगता है कि नई-नवेली सरकार अपनी आलोचना और किरकिरी बर्दाश्त नहीं कर पाई, जिसके बाद यह कदम उठाया गया।

पूर्व सीएम ईपीएस ने बताया ‘तानाशाही’

चैनलों का प्रसारण बंद होने के बाद तमिलनाडु की सियासत में भूचाल आ गया है। मुख्य विपक्षी दल AIADMK के मुखिया और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एडप्पादी के. पलानीस्वामी (EPS) ने विजय सरकार पर सीधा हमला बोला है।

ईपीएस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा कि, “यह कदम पूरी तरह से तानाशाही को दिखाता है। सरकार अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पा रही है और प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोंट रही है।”

‘चुनिंदा’ चुप्पी पर उठे सवाल

इस पूरी घटना ने देश के उस धड़े को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है, जो हर छोटी-बड़ी बात पर प्रेस की आजादी का रोना रोता है और पत्रकारों को ‘गोदी मीडिया’ कहकर निशाना साधता है। तमिलनाडु सरकार के इस कदम पर इस धड़े की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।

सच्चाई दिखाना और सत्ता से सवाल पूछना ही पत्रकारिता का मूल धर्म है। लेकिन टीवीके (TVK) सरकार का यह कदम साफ तौर पर पत्रकारों को झुकाने और डराने की कोशिश नजर आता है। क्या अब राज्यों में निर्भीक पत्रकारिता करने के लिए सिर्फ सरकार का गुणगान करना अनिवार्य हो जाएगा? जो ‘आईना’ दिखाएगा, क्या उसे केबल नेटवर्क से ही गायब कर दिया जाएगा?

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