बंगाल में मदरसों के सर्वे का आया आदेश, तो AIMIM नेता वारिस पठान के पेट में क्यों हुआ दर्द?

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वारिस पठान

फाइल फोटो

पश्चिम बंगाल में मदरसों के सर्वे को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। राज्य सरकार द्वारा मदरसों के व्यापक सर्वेक्षण का आदेश दिए जाने के बाद विपक्षी दलों और मुस्लिम संगठनों की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। इस बीच AIMIM नेता वारिस पठान ने भी सरकार के फैसले पर सवाल उठाए हैं।

राज्य सरकार ने शिक्षा विभाग को निर्देश दिया है कि 5 जुलाई तक मदरसों का सर्वे कर रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। सरकार का कहना है कि इस सर्वे का उद्देश्य यह पता लगाना है कि राज्य में संचालित मदरसे मान्यता प्राप्त हैं या नहीं, वे निर्धारित नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं तथा उनकी प्रशासनिक और शैक्षणिक स्थिति क्या है।

सरकार समर्थकों का दावा है कि पिछले कई वर्षों में मदरसों के संचालन को लेकर पर्याप्त निगरानी नहीं हुई और अब प्रशासन संस्थानों की वास्तविक स्थिति का आकलन करना चाहता है। उनका कहना है कि यदि कोई भी संस्थान अवैध रूप से संचालित हो रहा है या नियमों का पालन नहीं कर रहा है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।

वारिस पठान का हमला

मदरसों के सर्वे को लेकर AIMIM नेता वारिस पठान ने सरकार की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा और उससे जुड़ी राजनीति लगातार मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाती रही है।

उन्होंने कहा,

“जबसे बीजेपी की सरकार आई है, बीते 12-13 साल से इनका एक ही काम है। जहाँ भी जाएँ, इन्हें मुसलमानों से नफरत है। हमारे खाने-पीने से नफरत, हमारे पहनने-ओढ़ने से नफरत है। बुर्के से, हिजाब से, मस्जिद-मदरसे से, हर चीज़ से बस इनको नफरत ही नफरत है।”

पठान के इस बयान के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।

लेकिन वारिस पठान ये नहीं कहेंगे कि सर्वे का उद्देश्य किसी समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि सभी शैक्षणिक संस्थान कानूनी और प्रशासनिक मानकों के अनुरूप चल रहे हों। कुछ उदाहरण के तौर पर बताया जाए तो कई ऐसे अवैध मदरसे मिले जहाँ जिहाद की पढ़ाई हो रही थी. विज्ञान और मैथ्स नहीं पढ़ाए जा रहे थे. बल्कि यह पढ़ाया जा रहा था कि आप कैसे काफ़िर से बदला लेंगे।

RSS पर भी उठा सवाल

मदरसों के सर्वे पर प्रतिक्रिया देते हुए वारिस पठान ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने पूछा कि यदि मदरसों की जांच हो सकती है, तो RSS की कानूनी स्थिति पर भी सवाल क्यों नहीं उठाए जाते। लेकिन RSS का क्यों नहीं रजिस्टर किया है इसके बारे में वारिस पठान को नहीं पता होगा। असल में RSS को सरकार आज़ादी के बाद एक निजी/individual संस्था के तौर मान्यता दी।

असली सवाल क्या है?

असल सवाल यह है कि जब किसी मदरसों के स्टेटस की जांच हो रही तो वारिस पठान जैसे नेताओं के पेट में दर्द क्यों हो रहा है? आख़िर इन मदरसों के पीछे क्या छिपाया जा रहा है?

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